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आज महाराणा प्रताप की जयंती पर चलिये कुम्भलगढ़

महाराणा प्रताप (९ मई, १५४०- १९ जनवरी, १५९७) उदयपुर, मेवाड में शिशोदिया राजवंश के राजा थे. हिंदू कलेंडर के अनुसार उनका जन्म ज्येष्ठ शुक...

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जिब्राल्टर ऑफ इंडिया’ अर्थात ग्वालियर दुर्ग


मध्य प्रदेश राज्य का ग्वालियर शहर जो दिल्ली से 318 किलोमीटर व आगरा से मात्र 110 किलोमीटर
दक्षिण में आगरा-मुम्बई राष्ट्रीय मार्ग पर स्थित है.'संगीत और बावड़ियों का शहर' 'ग्‍वालियर के दो
स्‍वरूप हैं – एक पुराना जो तीन भागों में विभक्‍त है -कण्‍टोंमेंट , लश्‍कर और मुरार.
दूसरा स्वरूप नया ग्वालियर है.

ग्वालियर का उल्लेख पौराणिक गाथाओं में भी मिलता है.महाराष्ट्र के सतारा जिले से आये
सिंधिया परिवार ने नवीन ग्वालियर की स्थापना की थी.यहाँ स्थित बावडियां गवाह हैं कि जल संरक्षण में
लोग यहाँ कितने गंभीर रहे थे.फजल अली के एतिहासिक ग्रंथ - 'कुलियाते ग्वालियर' कहता हैं कि
ग्वालियर राज्य की नींव ही एक बावड़ी की स्थापना के साथ हुई .

एक जमींदार सूरसेन ने एक भव्य बावड़ी का निर्माण करके ग्वालियर राज्य की स्थापना की थी , यह
ऐतिहासिक बावड़ी ''सूरजकुंड ''आज भी ग्वालियर दुर्ग में स्थित है.

‘जिब्राल्टर ऑफ इंडिया’ अर्थात ग्वालियर दुर्ग

ग्वालियर शहर के गोपगिरि/गोप पर्वत/गोपाद्रि व गोपचन्द्र गिरीन्द्र आदि नामों से प्रसिद्द गोपाचल पर्वत पर
स्थित है यह 'ग्वालियर किला 'भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है.

‘फ्रांसीसी संस्‍कृति की खिड़की- पुडुचेरी 'और 'ओरोविला'

'पुडुचेरी 'और 'ओरोविला'


[चित्र को बड़ा देखने के लिए उस पर क्लिक करें]
पुडुचेरी जिसे हम सभी पाँडिचेरी के नाम से जानते थे .पुडुचेरी इस राज्य का नया नाम है।

भारत का यह केन्द्र शाषित प्रदेश पिछले लम्बे काल से फ्रेंच कालोनी के रूप में चर्चित रहा है.इसका इतिहास १६७३से तब प्रारंभ होता है जब चेन्नइ्रर् के पास सेंट होम के किलेबंद नगर में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेन्टमार्टिन को डचों ने हरा दिया था। मार्टिन हार कर फ्रंास नहीं लौटा. पांडिचेरी में आकर रहने लगा. कहते हैं उससमय यह छोटा सा गांव था, इस गांव को उसने जिंजी के राजा से खरीद लिया और धीरे-धीरे इसे एक समृद्ध नगरका रूप दिया.1954 में भारत व फ्रांस के मध्य एक समझौते के बाद पाँडिचेरी का प्रशासन भारत सरकार केअन्तर्गत है.अंतिम रूप से १ नवम्बर १९५६ को यह भारत संघ का अंग बन गया।

केंद्र
शाषित इस प्रदेश में चार क्षेत्र हैं-पुडुचेरी [यह राजधानी भी है],कराई कल ,माहे तथा यनाम
इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी और शेष तीन तरफ तमिलनाडु है, और लगभग 150 किलोमीटर दक्षिण में पूर्वी तटपर कराईकल है , माहे पश्चिम मे केरल से घिरे पश्चिमी घाटों के मालाबार तट पर स्थित है.यनाम आंध्र प्रदेश केपूर्वी गोदावरी जिले से सटा हुआ है और विशाखापत्तनम से 200 कि.मी. की दूरी पर है.


तमिल, तेलुगू, मलयालम व फ्रेंच भाषा सरकारी कामकाज के लिये स्वीकृत है।
इस तरह कराईकल(तमिलनाडु), माहे (केरल), यनाम (आंध्र प्रदेश), को भी मिलाकर पुडुचेरी केंद्रशासित प्रदेश बना है।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पांडिचेरी को ‘
फ्रांसीसी संस्‍कृति की खिड़की’ कहा था।यह नगर फ्रांसीसी-तमिल वास्तुकला का संगम तो है ही इसे फ्रांस के 18 वीं सदी के किलेबंद समुद्रतटीयशहर ‘बास्टाइड के नमूने पर बना भी बताया जाता है.
पूर्व तथा पश्चिम संस्कृति से प्रभावित पांडिचेरी में हस्तशिल्प से तैयार चमड़े की वस्तुएं, मिट्टी के बरतन, हाथ सेतैयार कागज, धूप तथा पुराना औपनिवेशिक फर्नीचर आदि खूबसूरत और लुभावनी वस्तुएं मिलती हैं.
धान यहाँ की मुख्य फसल है।
वर्तमान में पुडुचेरी के लेफ्टिनेंट गवर्नर श्री इकबाल सिंह हैं और मुख्य मंत्री श्री विथिलिंगम हैं.
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निकटतम
हवाई अड्डा-माहे से 70 किलोमीटर दूर कालीकट[केरल] हवाई अड्डा है।
देखने के लिए प्रमुख स्थल हैं-पांडेचेरी संग्राहलय ,समुद्र तट [बीच],मास्सी मगन फेस्टिवल,औरोबिन्दो आश्रम
arbindo-ashram/chunamber beach
महर्षि अरविन्द घोष
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सीरती पर महान संत, कवि तथा भारतीय आध्यात्मिकता के महान प्रवर्त्तक श्री अरविंद अपने जीवन के अंततक अपनी दृष्टि तथा विचारों का प्रसार करते रहे थे आईये जानते हैं उनके बारे में -:
महर्षि अरविन्द घोष का जन्म 15 august ,१८७२ कोलकता में हुआ .
वह एक महान योगी एवं दार्शनिक थे.बाल्यावस्था में कुछ समय दार्जिलिंग में शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह सात साल की उम्र में अपने भाइयों के साथ शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गये थे.1892 में भारत वापस लौट आये.
1905 के बंगाल विभाजन के बाद हुए क्रांतिकारी आंदोलन और 1908-09 में अलीपुर बम कांड मुकदमा चला. जेल में कई आध्यात्मिक अनुभव के बाद वे अंतत: सक्रिय राजनीति से अलविदा कह तत्कालीन फ्रांसीसी शासन वाले पांडिचेरी चले गए. पांडिचेरी में उन्होंने आध्यात्मिक साधनाएँ की और मृत्यु पर्यन्त [५ दिसम्बर १९५० को]तक वहीं रहे.पांडिचेरी में रहते हुए अरविन्द ने अपने महाकाव्य सावित्री और सबसे चर्चित पुस्तक ‘डिवाइन लाइफ( हिन्दी में दिव्य जीवन के नाम से अनूदित) की रचना की थी.




ओरोविला'-:
यहाँ महर्षि अरविन्द के नाम से 'ओरोविला'एक अन्तर्राष्ट्रीय नगर बसाया गया है. महर्षि अरविन्द आश्रम अन्तर्राष्ट्रीय योग शिक्षा एवं अनुसंधान केन्द्र के रूप में भी विख्यात है.
रूद्रेलाल मैरीन पर अरबिंदो ने फ्रांसीसी महिला मीरा अलफास्सा की सहायता से इस आश्रम की स्थापना की थी.हाँ का मुख्य सूत्र मानव एकता है.

गोल गुंबद के आकार मे बना मातृमंदिर ओरोविला [उषा नगरी] से १० किलों मीटर दूर है.
मंदिर के अंदर बने ध्यानकक्ष में रखा बडा क्रिस्टल बाल सूर्य की रोशनी में खूबसूरत आभा बिखेरता है.
यहीं एक बड़ा बरगद का पेड़ भी है जिसकी उम्र बहुत अधिक नहीं केवल १०० बरस बताई जाती है.
यह मंदिर फ्रांसीसी महिला द मदर द्वारा स्थापित हुआ था.श्री अरविंद जी ने उन्हें ही आश्रम का संचालन सोन्पा हुआ था.उन्हें श्रीमाता के नाम से भी जानाजाता है.
यह स्थान युनेसको द्वारा संरक्षित है.
रेफेरेंस-
Official web sites-
http://www.pon.nic.in/
http://tourism।puducherry.gov.in/

औरोविल के बारे में अधिक जानकारी के लिए -:

www.auroville.org

or-visit-:

La Boutique d’ Auroville,

38 J.Nehru Street,

Puducherry

Phone: 0413 – 2337264

सहेलियों की बाड़ी-उदयपुर


झीलों की नगरी उदयपुर.
यहाँ का एक प्रसिद्द पर्यटन स्थल है  'सहेलियों की बाड़ी' जिसके बारे में आज मैं बता रही हूँ...
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यह तस्वीर 'सहेलियों की बाड़ी' की है जो उदयपुर शहर में फतहसागर झील के किनारे है. इस बेहद सुंदर बाग को १७१० में राणा संग्राम सिंह द्वितीय ने शाही परिवार की महिलाओं के मनोरंजन हेतु ख़ास बनवाया था.



महाराणा फतह सिंह ने इस बाग़ का पुनर्निर्माण कराया था. इस बाग़ में मुख्य बडे ताल के चारों कोनो में शुद्ध काले संगमरमर की छतरियां बनी हैं . सुंदर फूलों की क्यारियाँ , कमल के फूलों के चार ताल , हर तालाब, में पानी का फव्वारा ,हर फव्वारा संगमरमर के चार सफ़ेद हाथियों से सुसज्जित है .



हर हाथी की मूर्ति को एक ही पत्थर से काट कर बनाया गया था.इन में यह ख़ास बात है इन में कोई जोड़ नहीं है..
ये फव्वारे  बिना बरसात के मौसम के ही बरसात के मौसम जैसा अनुभव देते हैं.[बहुत ही रूमानी जगह हुआ करती होगी!!:) !अब भी पर्यटक यही अनुभव ले कर निकलते हैं कि जैसे परियों की भूमि से हो आए हैं!
इन फव्वारों में ऊर्जा बचाने की तकनीक का इस्तमाल हुआ है..यह गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत पर काम करते हैं.जब फव्वारों से 'बारिश की आवाज़ 'के साथ जैसे पानी गिरता है उसी समय सफ़ेद हाथियों की सूंड से पानी ,कमल फूल की पंखुरियों पर गिरता है.और छतरी के चारों और से गिरता पानी बरसात का अनुभव देता है!



इस बाग़ के बारे में 'राजपूतों का इतिहास'[करनल टोड के अनुसार] किताब में लिखा है कि यह बाग़ उदयपुर की राजकुमारी को ४८ दासियों के साथ दहेज़ में दिया गया था.




  • यह किताब मैं ने पढ़ी है.इंगलिश में उन्होने इसे garden of Maids कहा है.
  • इस में एक छोटा सा म्यूज़ियम भी है .ये बरसाती फ़व्वारे इंग्लॅण्ड से महाराणा भोपाल सिंह जी ने लगवाए थे.
  • Travel and Leisure Magazine, ने इसे एशिया का दूसरा सब से खूबसूरत शहर घोषित किया है.
  • बहुत सी फिल्मों की शूटिंग यहाँ हुई है. देवानंद वहीदा की गाइड, सुनील दत्त साधना की मेरा साया, और अमिताभ सैफ़ की एकलव्य (यहां से ४७ KM दूर देवीगढ पैलेस मे) हुई है. एवम राजा जानी आदि फ़िल्में प्रमुख है.
  • और बांड सिरीज की फ़िल्म आक्टोपसी ( जिसमे रोजर मूर, कबीर बेदी और विजय अमृतराज ने अभिनय किया था ) का फ़िल्मांकन भी यहीं हुआ था.


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'उदयपुर -जिसे रूमानी शहर ,'सफ़ेद शहर '/ 'बागों का शहर और 'झीलों का शहर 'भी कहा जाता है.राजस्थान में है.दिल्ली से ६७० किलोमीटर दूर है.

महाराणा प्रताप (1542-1597) उदयपुर, मेवाड में शिशोदिया राजवंश के राजा थे। राजपूत साम्राज्य में मेवाड़ की राजधानी ,पहले चित्तोडगढ़ उस के बाद उदयपुर थी. उदयपुर को मुग़ल कभी छू भी नहीं पाये थे!

अब ये तो हुई उदयपुर की चर्चा. अब इस शहर और इसके शासकों यानि मेवाड के सिसोदिया शासकों के बारे मे कुछ जानते हैं.

'सहेलियों की बाड़ी' को बनवाने वाले महाराणा संग्राम सिंह [द्वितीय ]से जुडे कुछ रोचक ऐतिहासिक तथ्य जो  मैं जानकारी के लिए यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ --


१- उन के पूर्वज 'महाराणा संग्राम सिंह {प्रथम} के नाम पर उन का नाम रखा गया था.जो राणा सांगा के नाम से भी जाने जाते हैं. महाराणा संग्राम सिंह {प्रथम} (राज 1509-1527) उदयपुर में शिशोदिया राजवंश के ५० वें राजा थे. वह उन महाराणाओं में एक थे जिसका नाम मेवाड के ही नहीं , भारत के इतिहास में गौरव के साथ लिया जाता है।


२-महाराणा सांगा के चौथे बेटे महाराणा उदय सिंह के सब से बडे बेटे महाराणा प्रताप थे. इन्हीं महाराणा उदय सिंह ने ही 'बाज़ बहादुर' को शरण दी थी.'बाज़ बहादुर 'के बारे में आप पहले के पहेली अंक में पढ़ चुके हैं.


३- महाराणा संग्राम सिंह [द्वितीय] ने मार्च २४ , १६९० में २० साल की उम्र में मेवाड़ की गद्दी संभाली मगर ४४ साल की अल्पायु में [January 11, १७३४] स्वर्ग सिधार गए.उनकी सभी पत्नियाँ उनके साथ सती हो गई थीं. ५६ खम्बों का एक स्मारक उन की याद में अब भी खड़ा है.


४- इन की पत्नियों में मुख्य दो महारानियाँ थीं- एक -राजकुमारी कुंदन कुंवर[ताना से]और दूसरी जैसलमेर की राज कुमारी थीं.


5-जिस मेवाड़ [शिशोदिया] राजवंश के यह ६१ वें शासक वह राजवंश दुनिया का सबसे पुराना और सबसे लंबा शासन करने वाला राजवंश माना जाता है.जो 569 AD से सन् १९४७ तक चला.


6-महाराणा अरविन्द सिंह जी [१९८४-अब तक],इसी वंशावली में ७६ वें और वर्तमान में उदयपुर के ३४ वें महाराणा हैं.जो मेवाड़ भवन की देख रेख कर रहे हैं.

अधिक जानकारी हेतु ,यह उनकी अधिकारिक साईट है.http://www.mewarindia.com/

=============================अल्पना वर्मा =====================

जल्द आ रही है एक नयी शृंखला ....

इंसान ने चाहे जितनी भी तरक्की कर ली हो मगर ढ़ेरों ऐसे रहस्य हैं जिनपर से पर्दा उठाना अभी बाकी है.
ऐसी ही कुछ जगहें  हैं जिनके बारे में हम बहुत कुछ सुनते हैं...
प्रमाणों के अभाव में उन बातों को साबित नहीं कर पाते तो कभी कुछ प्रमाण होते हुए भी सहज विश्वास नहीं कर पाते !
विज्ञान की स्नातक हूँ ,अंधविश्वासी कतई नहीं हूँ ...आस्तिक हूँ केवल इतनी कि कोई बहुत बड़ी शक्ति है जो हम सब को नियंत्रित करती है....विज्ञान ,इतिहास से अलग मेरी  रूचि का एक और क्षेत्र  रहा है वह है  'परा मनोवैज्ञानिक' विषय ...
बचपन में एक विशेषांक पढ़ा था ..शायद नव वर्ष पर नवभारत टाइम्स अखबार ने निकला था जिसमें मैडम क्युरी[?] की क्रिस्टल बॉल और ढ़ेरों भविष्यवाणियों का ज़िक्र था ..उस में अलौकिक शक्तियों के विषय में तस्वीरों सहित कुछ किस्से -लेख पढ़े थे तब से इस विषय में खासकर ऐसी जगहों के बारे में जानने की उत्सुकता रही जहाँ ऐसी गतिविधियों को अनुभव किया गया है.

इस शृंखला द्वारा मात्र उन  स्थानों के बारे में पाठक को बताना है जिनके बारे में तरह-तरह की बातें  प्रचलित हैं.जिन्हें 'भूतहा ' कहा जाता है , इन बातों में कितनी सच्चाई है मैं नहीं जानती इसलिए यहाँ लिखी सभी बातों पर विश्वास न करें .

इस कड़ी के लेखों का उद्देश्य अंध विश्वास फैलाना बिलकुल नहीं है ,न ही इन स्थानों के प्रति खौफ पैदा करना बल्कि जिन्हें इस विषय में रूचि है उन के लिए अंतर्जाल के विभिन्न स्त्रोतों से जानकारी एकत्र कर यहाँ उपलब्ध कराना है.

मैं भूत-प्रेतों में विश्वास नहीं करती लेकिन यह मानने को विवश हूँ कि इस लोक से इतर कोई और दुनिया भी इस ब्रह्माण्ड में है जिसके बारे में हम अनजान हैं.
एक न एक दिन उस दुनिया का रहस्य भी वैज्ञानिक ढूँढ़ निकालेंगे.तब तक इन बातों पर जो यहाँ बताई गयी जगहों के बारे में लोग कहते रहते हैं उन्हें जान लें और प्रयास करें कि क्या वाकई इन बातों में कोई सत्य है या नहीं.

इन सभी स्थानों पर जाने वाले लोगों के अनुभव अलग -अलग हैं.इसलिए कोई एक राय बना पाना कठिन है.परामनोविज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले कई लोगों ने इन स्थानों पर जाकर कई प्रयोग किये और अधिकतर मानते हैं हैं कि नकारात्मक ऊर्जा कई स्थानों  पर मिली है.क्या इसी नकारात्मक उर्जा को जन साधारण भूत कह देता है ?
यह सोचना मैं आप पर छोड़ देती हूँ.
मगर इतना ज़रूर कहना चाहूँगी कि अगर आप ऐसे स्थानों पर जा कर अनुभव लेना चाहते हैं तो इन स्थानों के आसपास के स्थानीय लोगों की राय शुमारी भी ज़रूर ले लिजीये.

बस प्रतीक्षा  कीजिए ....जल्द आ रही है यह नयी  शृंखला .......

वृन्दावन

वृन्दावन
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उत्तर प्रदेश में वृन्दावन है जो कि मथुरा से १२ किलोमीटर दूर है.
राधा -कृष्ण का ऐसा कौन सा भक्त होगा जो वृन्दावन  को न जानता हो.वहाँ ढ़ेरों मंदिर हैं.लेकिन मैं बांके बिहारी जी और इसकोन मंदिर ही जा सकी,
अब यह कहूँ कि बांके बिहारी जी ने दर्शन देने थे सो सुबह सुबह मंदिर के पट  खुलते ही पहुँच सके  ,और बहुत ही अच्छे दर्शन भी हुए.
सब कुछ अच्छा परन्तु उत्तर प्रदेश में पर्यटन से इतना अधिक राजस्व आता है परन्तु फिर भी इन  स्थलों में व्यवस्था बिलकुल भी अच्छी नहीं है.बांके बिहारी जी के मंदिर तक पहुँचने में ही कठिनाइयां होती हैं ,उस गली के उस संकरे रास्ते को क्यों नहीं सही किया जाता ?
पूरे वृन्दावन में साफ़ सफाई पर ध्यान देने की घोर आवश्यकता है,गलियों में कई जगह नालियाँ खुली हैं जिनसे गुजरते हुए , बदबू आती है ,मुख्य सड़क के दोनों और मंदिर बनते जा रहे हैं जिनकी भव्यता देखते ही बनती है परन्तु क्या ये नए नए मंदिर बनाने वाले शहर की व्यवस्था  नहीं सुधार सकते ?त्यौहार पर सुबह ११ के बाद मुख्य सड़क पर इतनी भीड़ हो जाती है कि पुलिस भी बेबस सी दिखती है.
खैर प्रशासन को सुध लेनी चाहिये कि शहर में मंदिरों के आसपास की जगहें भी साफ़ सुथरी रहें और एक के बाद एक नए खुलते मंदिर ,मंदिर रहें दूकान न बनें!
वृन्दावन राधा रानी की नगरी है ,मिटटी के गिलास में मलाई वाली लस्सी और लौकी की मिठाई मुझे बहुत अच्छी लगी.
वहाँ   स्थित प्रसिद्द वन 'निधिवन'के बारे में अगली पोस्ट्स में..
कुछ तस्वीरें जमा की हैं जिन्हें इस विडियो में डाला है ,आप भी देखें -

==========राधे -राधे ============================
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ताज महल [आगरा ]

कुछ महीने पहले आगरा जाना हुआ ,ताजमहल एक बार फिर से देखा ,कुछ तस्वीरें लीं...उन तस्वीरों को इस विडियो में डाला हुआ है..देखियेगा...दिल्ली से आगरा ..ताज एक्सप्रेस रास्ते का प्रयोग कर रहे हैं तो सावधानी से करें..बहुत अधिक स्पीड से गाडी न चलायें, टायरों की हवा कितनी रखनी है इस बारे आवश्यक निर्देश जगह-जगह दिए गए हैं ,उन्हें पढ़ लें.इतनी अधिक प्रसिद्द इमारत शहर में होने के बावजूद इस शहर का हाल बहुत अधिक सुधरा हुआ नहीं दिखा...जिस हिसाब से यहाँ पर्यटक आते हैं उस लिहाज से इस शहर को और अधिक सुन्दर व् बेहतर बनाया जाना चाहिये.इमारत के बारे में क्या कहूँ ..तेजोमहालय से ताजमहल तक के इसके सफ़र के बारे में लोगों ने बहुत कुछ लिखा है ,गूगल में तेजोमहालय लिख कर खोजेंगे तो बहुत सी चित्रमय जानकारी मिल जायेगी ,उन पोस्ट्स में इस विषय  में पढ़ सकते हैं , मैं खुद नहीं जानती कि सच क्या है?
जो भी हो अगर यह कभी मंदिर  रहा भी हो तो अब क्या करियेगा ?सालों से तो अब यह मकबरा ही है अब यह मंदिर रहा ही नहीं ..मेरे लिए  यह एक खूबसूरत इमारत है जिसे देखकर  मन इसे देखते रहने को करता है.
अद्भुत कारीगरी !

कोलकाता के कुछ दर्शनीय स्थल

भारत की ऐतिहासिक महानगरी और पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता .

इसे पूर्वी भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है . इस शहर को सिटी ऑफ़ जॉय के नाम से भी जाना जाता है.यहाँ रोमन स्थापत्य कला से बने बड़े-बड़े घर और बिल्डिंगे और सड़को पर चलती ट्रामें कॉलोनियल समय की याद दिलाते है.पूर्वांचल एवं सम्पूर्ण भारतवर्ष का प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र के रूप में कोलकाता का महत्त्व अधिक है.

देखने के लिए यहाँ कई जगहें हैं जैसे --मैदान और फोर्ट विलियम, हुगली नदी के समीप भारत के सबसे बड़े पार्कों में से एक है.फोर्ट विलियम को अब भारतीय सेना के लिए उपयोग में लाया जाता है.नाखोदा मस्जिद ,सेंट पॉल कैथेड्रल चर्च ,पारसनाथ जैन मंदिर ,मदर टेरेसा होम्स [गरीबों में से भी गरीब लोगों ],बॉटनिकल गार्डन्सआदि.

यह शहर रेलमार्गों, वायुमार्गों तथा सड़क मार्गों द्वारा देश के विभिन्न भागों से जुड़ा हुआ है.
यहाँ पयर्टकों के ठहरने के लिए कोलकाता में बहुत से होटल और पर्याप्त धर्मशालाएं भी हैं.

अब संक्षेप में बताती हूँ यहाँ स्थित कुछ धार्मिक स्थलों के बारे में -;

जैस आप सब जानते ही हैं कि ५१ शक्तिपीठों में से कोलकाता में भी एक शक्तिपीठ है. यहां सतीदेह के दाहिने पैर की चार अंगुलियां (अंगूठे को छोड़कर) गिरी थीं.इसलिए भी देवी भक्तों के लिए यह स्थान धार्मिक महत्व का है.

कलकत्ता में सर्वमंगला, तारासुंदरी, श्रीसत्यनारायणजी, नवीन श्रीराम मंदिर, भूतेश्वर महादेव, श्री दाऊजी, श्री सांवलियाजी आदि मंदिर तो बहुत से हैं, किंतु जिन्हें तीर्थस्थलों में गिना जा सके, ऐसे प्रधान चार ही स्थान हैं -
१. आदिकाली, २. काली, ३. दक्षिणेश्वर और ४. बेलूर मठ.

१-श्री सिद्धेश्वरी काली बाड़ी.
यह भी कोलकाता में एक प्राचीन स्थान है.

२-कालीघाट का काली मंदिर -

यह मंदिर अत्यंत प्रख्यात है. कुछ लोग काली मंदिर को ही शक्तिपीठ मानते हैं.
देवी मंदिर के समीप ही नकुलेश्वर शिव मंदिर है.






३-बेलूर मठ -

दक्षिणेश्वर के पास से गंगा पार होकर हावडा की ओर आने पर कुछ दूर पर गंगा किनारे बेलूर मठ है.
इस मठ की स्थापना स्वामी विवेकानंदजी ने की थी.श्रीरामकृष्ण मिशन का यहीं प्रधान कार्यालय है.यहां १938 में बना मंदिर हिंदू , मुस्लिम और इसाई शैलियों का मिश्रण है. यहां अत्यंत भव्य श्रीरामकृष्ण मंदिर है. यहीं स्वामी विवेकानंदजी की समाधि भी है.

४-जैन मंदिर -

यहां का प्रसिद्ध श्री पार्श्वनाथजी का जैन मंदिर बहुत ही सुंदर और दर्शनीय है.
प्रसिद्ध महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर, श्री केशवचंद्र सेन, स्वामी विवेकानंद, कवींद्र श्री रवींद्रनाथ ठाकुर तथा श्री चित्तरंजनदास आदि की जन्मभूमि कोलकाता ही है.
यहां का हावड़ा पुल जग-प्रसिद्ध है.



५-विक्टोरिया मेमोरियल -

रानी विक्टोरिया की याद में बनाया गया यह विक्टोरिया मेमोरियल यहाँ का ख़ास आकर्षण है। यूरोपियन वास्तुकला और मुगल काल की शिल्पकलाओं का सुन्दर मिश्रण देख सकते हैं.
सर विलियम एमर्सन ने इसका निर्माण करवाया था। सफेद संगमरमर से बनी इस इमारत का निर्माण कार्य १९०६ से १९२१ तक चला था.
अब यह इमारत संग्रहालय है।

6-दक्षिणेश्वर काली मंदिर -

कोलकाता के उत्तर में विवेकानंद पुल के पास गंगा नदी [जिसे कोलकाता में हुगली नदी भी कहते हैं.] के किनारे जान बाजार की महारानी रासमणि ने सन 1847 में माँ काली का यह अत्यंत भव्य मंदिर बनवाया था. सन 1855 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ था.यह बी बी डी बाग से 20 किलोमीटर दूर है. स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट नमूना यह मंदिर विशाल इमारत के रूप में चबूतरे पर स्थित है.
25 एकड़ क्षेत्र में स्थित 46 फुट चौड़ा तथा 100 फुट ऊँचा , नवरत्न की तरह निर्मित 12 गुंबद वाले इस मंदिर के चारों ओर भगवान शिव के बारह मंदिर स्थापित किए गए हैं.
भीतरी भाग में चाँदी से बनाए गए कमल के फूल जिसकी हजार पंखुड़ियाँ हैं, पर माँ काली शस्त्रों सहित खड़ी हुई हैं. ऊपर की दो मंजिलों पर नौ गुंबद समान रूप से फैले हुए हैं। गुंबदों की छत पर सुन्दर आकृतियाँ बनाई गई हैं.



श्री रामकृष्ण देव परमहंस -:
मां काली के आराधक, मानवता के पुजारी ,महान संत एवं विचारक स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी 1836 को बंगाल के कामारपुकुर नामक गाँव में हुआ था। उन्हें इस मंदिर का प्रधान पुजारी बनाया गया था.

श्रीरामकृष्ण देव परमहंस ने यहीं महाकाली की आराधना की थी .कहते हैं उन्हें माँ काली ने यहीं दर्शन दिए थे.मंदिर से लगा हुआ परमहंस देव का कमरा है, जिसमें उनका पलंग तथा दूसरे स्मृतिचिह्न सुरक्षित हैं.मंदिर के बाहर परमहंस की पूर्वाश्रम की धर्मपत्नी श्री शारदा माता तथा रानी रासमणि का समाधि मंदिर है और वह वट वृक्ष भी है, जिसके नीचे परमहंस देव ध्यान किया करते थे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का अधिकांश जीवन प्राय: समाधि की स्थिति में ही व्यतीत हुआ. वे सेवा पथ को ईश्वरीय, प्रशस्त मानकर अनेकता में एकता का दर्शन करते थे.
स्वामी विवेकानन्द श्री रामकृष्ण देव के परमप्रिय शिष्य थे.
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पोस्ट प्रकाशन

कभी  व्यस्तताएँ हैं और कभी मिजाज़ दुरुस्त नहीं रहते ..और कभी समझ नहीं आता कि अब दर्शनीय स्थल के लिए किस राज्य की और चला जाए !...बस इसलिए पोस्ट प्रकाशन की गति बहुत धीमी है .

एक अनुरोध है कि अगर आप किसी स्थान विशेष पर पोस्ट चाहते हैं या सुझाव देना चाहें कि मुझे किस स्थान विशेष पर लिखना चाहिये  तो स्वागत है .
---अल्पना वर्मा 

शंकराचार्य पहाड़ी





श्रीनगर में गोपाद्री पहाड़ी पर स्थित मन्दिर का इतिहास लगभग डेढ़ हजार साल पुराना है।
कश्मीर की यात्रा के समय आदि शंकराचार्य ने इस पहाड़ी पर कुछ दिनो तक तपस्या की थी।जिसके कारण यहाँ एक विशाल मंदिर बनाया गया ,जिसे शंकराचार्य मंदिर कहते हैं.हिन्दुओं के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है.
मंदिर के कारण लोगो ने इस पहाड़ी का नाम शंकराचार्य पहाड़ी रख दिया था जो सरकारी दस्तावेजो में भी मौजुद है। लेकिन  भारत सरकार के ASI ने शंकराचार्य पहाड़ी का नाम  'तख्ते सुलेमान 'रख दिया  है।
पुरातत्व विभाग बिना भारत सरकार की सहमती से कुछ नहीं कर सकता तो इस विषय में   जो जानकारी अंतर्जाल पर उपलब्ध है उसके आधार पर ये ही समझ आता है कि यह मौलिक तथ्यों को नज़र अंदाज़ कर के किया जा रहा है ,
क्या वोटों की राजनीति इतनी गिर गयी है कि अपने इतिहास से छेड़छाड़ की जाती रहे?
 अधिक जानकारी इस लिंक पर है -हिंदी अनुवाद जल्द प्रस्तुत करूंगी.
http://www.indiafacts.co.in/post10/#sthash.YPC4a1zH.dpuf


इससे पूर्व हरी पर्वत ,उमा नगरी ,किशन गंगा के नाम बदल दिए गए मगर किसी ने विरोध नहीं किया परन्तु अब एक आवाज़ उठी है आप नीचे दिए गए तथ्यों को पढ़ें और अपने विवेक से खुद निर्णय करें कि क्या सही है ?
    1.  
    2. Petition by
      Berkeley, CA

आभार.

कुंभ नगरी -नाशिक

नासिक [महाराष्ट्र ] -:

गोदावरी नदी के तट पर स्थित यह नगर हिन्दू तीर्थ यात्रियों के लिए प्रमुख है.महाराष्ट्र राज्य में यह शहर मुम्बई से लगभग  170  किमी और पुणे से २०५ किमी दूर है.पुराणों के अनुसार यह वह पावन धरती है जहां भगवान राम, सीता और रामानुज के पतितपावन चरण पडे हैं राम घाट पर कहते हैं स्वय भगवान राम ने डुबकी लगाई थी.

यहाँ बहुत से सुंदर मंदिर और घाट हैं,त्योहारों के समय बहुत रौनक रहती है.अंगूर और सतंरों के मामले में नासिक हिन्दुस्तान का सबसे बडा केन्द्र बताया जाता है.

नाशिक शक्तिशाली सातवाहन वंश के राजाओं की राजधानी थी. मुगल काल में इस शहर को गुलशनबाद के नाम से जाना जाता था.डॉ. अम्बेडकर ने १९३२ में नाशिक में अस्पृश्यता आंदोलन और जन आंदोलन चलाया था.

सोन भंडार गुफा ,राजगीर [बिहार]

 
राजगीर बिहार में एक लोकप्रिय पर्यटक स्थल है,प्रकृति की सुन्दरता यहाँ देखते बनती है पांच तरफ से पहाड़ियों से घिरे इस क्षेत्र से बानगंगा बहती है .
कभी यहाँ  वैभवशाली महानगर हुआ करता था आज वहां एक छोटा गाँव भर है.राजगीर अपनी गुफाओं,किलों,बोद्ध और जैन मंदिरों के लिए जाना जाता है.वेणु विहार एक बहुत ही खूबसूरत स्थल है जिसे भगवान बुद्ध  को उस समय के राजा बिम्बीसार ने भेंट में दिया था.यहीं जापानी बुद्ध संघ ने विश्व शान्ति स्तूप भी बनवाया हुआ है.

विश्वप्रसिद्ध दिल्ली का 'लौह स्तम्भ'-

हमारा भारत कितना अद्भुत है!
कितना ज्ञान बिखरा हुआ है यहाँ प्राचीन धरोहरों के रूप में ,जिसे हमें समय रहते संभालना है.
दुनिया की प्राचीनतम और जीवंत सभ्यताओं में से एक है हमारे देश की सभ्यता.

हमारी प्राचीन धरोहरें बताती हैं कि हमारा देश अर्थव्यवस्था,स्वास्थ्य प्रणाली,शिक्षा प्रणाली, कृषि तकनीकी,खगोल शास्त्र ,विज्ञान , औषधि और शल्य चिकित्सा आदि सभी क्षेत्रों में बेहद उन्नत था.
मैगस्थनीज से लेकर फाह्यान, ह्वेनसांग तक सभी विदेशियों ने भारत की भौतिक समृध्दि का बखान किया है.

प्राचीन काल में उन्नत तकनीक और विराट ज्ञान संपदा का एक उदाहरण है अभी तक 'जंगविहिन' दिल्ली का लौह स्तंभ'.इसका सालों से 'जंग विहीन होना ' दुनिया के अब तक के अनसुलझे रहस्यों मे माना जाता है.

महापरिनिर्वाण मंदिर-कुशीनगर [गोरखपुर]

गोरखपुर
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उत्तर प्रदेश राज्य पूर्वांचल में गोरखपुर जिले को बाबा गोरखनाथ का धाम कहा जाता है .
मुंशी प्रेमचन्द की कर्मस्थली व फिराक गोरखपुरी की जन्मस्थली के रुप मे भी प्रसिद्धि प्राप्त है.अनेकानेक पुरातात्विक, अध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों की धरती को अमर शहीद पं0 राम प्रसाद बिस्मिल, बन्धु सिंह व चौरीचौरा आन्दोलन के शहीदों की शहादत स्थली के रूप में भी याद किया जाता है.

वैदिक काल में यह स्थान भगवान राम के कौशल राज्य का एक हिस्सा बताया गया है.बारहवीं शताब्दी में मोहम्मद गौरी के राज में प्रसिद्ध तांत्रिक और तपस्वी बाबा गोरखनाथ हुए थे, उन के नाथ सम्प्रदाय का प्रभाव हिन्दू धर्म के सभी वर्गो में दिखाई पड़ता है.उनकी समाधी देखने भी बहुत से पर्यटक आते हैं. ' मगहर ' यहाँ से लगभग २० किलोमीटर पर है जहाँ संत कबीर की समाधी स्थल है.

चेतक स्मारक या चेटक स्मारक ??

आज फेसबुक पर टहलते हुए एक तस्वीर पर निगाह पड़ी ...
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जिसे मैं वहाँ से यहाँ जस का तस पोस्ट कर रही हूँ ,अगर किसी को आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें .सामग्री हटा दी जायेगी 
कृपया बताएँ कि क्या चेतक को स्थानीय भाषा में 'चेटक'  कहा जाता है?
या यह  उनके नाम की वर्तनी- त्रुटि है?
 अगर यह त्रुटि है तो सम्बंधित अधिकारी  कृपया इस पर ध्यान दें और अपेक्षित सुधार करें.
यह स्थल राजस्थान राज्य के उदयपुर शहर के हल्दी घाटी में  स्थित है.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय स्मारक

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ऐतिहासिक  भवन आगा खान पैलेस भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का एक राष्ट्रीय स्मारक है.यह महाराष्ट्र  राज्य के पुणे  शहर में स्थित है.इसे 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय स्मारक'  के नाम से भी जाना जाता है.
आगा खान महल  को १८९२ में सुल्तान मोहमद शाह आगा खां तृतीय ने इसे बनवाया था,इसे बनवाने का उद्देश्य सूखा पीड़ित प्रजा को रोज़गार देना था.
इसे बनाने में ५ साल और १२ लाख रूपये खर्च हुए थे. ६.५ हेक्टेयर में फैले  हुए   इस भवन की खूबसूरत  वास्तुकला इटालियन है.सुन्दर उद्यान भी यहाँ देख सकते हैं .कुल मिला कर १९ एकड़ में यह  दो मंजिला महल फैला हुआ  है.

हिन्दू-मुस्लिम एकता की प्रतीक: एक दरगाह


सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की देवाशरीफ स्थित दरगाह
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उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है 'बाराबंकी'.यह लखनऊ से २९ किलमीटर पूरब में स्थित है 

बाराबंकी को नवाबगंज के नाम से भी जाना जाता है.यह जगह ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण है।
इस जगह पर कई राजाओं ने लम्बे समय तक शासन किया
देवाशरीफ स्थित दरगाह लखनऊ से 42 किलोमीटर और बाराबंकी के जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर की दूरीपर स्थित है

सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की जन्मस्थली देवा है.उनका जन्म वर्ष 1823 इसवी में हुआ था

'ईंटों से बना 'भारत का सबसे पुराना किला..


पुरातत्व शोधों के अनुसार उत्तरी पंजाब में मानव सभ्यता के चिन्ह ईसा पूर्व ४०,००० सालों से दिखाई दिए हैं.७००० साल ईसा पूर्व इंसान ईंट मिट्टी के झोंपड़े बना कर रहते थे,भेड़ बकरियां पाला करते थे.इनके चिन्ह आज भी यहाँ मिलते हैं.१५ AD में यहाँ कुषाण साम्राज्य की स्थापना हुई.

पंजाब राज्य के मालवा इलाके में लखी जंगल में तीसरी सदी में राओ भाटी द्वारा 'बठिंडा शहर' स्थापित किया गया था. बाल राओ भाटी के नाम पर ही इस स्थान का नाम बठिंडा पड़ा.

यह कभी राजा जयपाल की राजधानी भी हुआ करती थी.

यहाँ की पांच झीलों के कारण इस शहर को' झीलों का शहर' भी कहते हैं.
सिखों के पांचवें तख्त दमदम साहिब यहाँ से थोड़ी दूरी पर ही है.

आमेर का किला

आमेर का किला 


भारत के प्रदेश राजस्थान की राजधानी जयपुर,जिसे भारत का पेरिस कहा जाता है.इसपर कछवाहा समुदाय के राजपूत शासकों का शासन था।

जयपुर से ११ किलोमीटर दूर ,कभी सात शताव्दियों तक ढूंडार के पुराने राज्य के कच्छवाहा शासकों की राजधानी आमेर ही थी.
यहीं है यह प्रसिद्ध  आमेर का किला.......आरंभिक ढाँचा अब थोड़ा ही बचा है।.

महल के संस्थापक -:

अब इस में भी अलग अलग मत हैं.कहते हैं आमेर 'मीणा जाति के सूसावत राजवंश'[967Ad-1037Ad].में देवी अम्बा की श्रद्धा में बनवाया गया था.

आमेर महल की नींव कांकलदेव के समय से जोड़ी गई है जबकि महल में रखे शिलालेख में इसे मानसिंह प्रथम द्वारा बनाया गया बताया है.

जो तथ्य मुझे मिले हैं उन में भी यही है कि राजा मान सिंह [प्रथम ] ने पुराने भवन 'आम्बेर''के अवशेषों पर ही इस दुर्ग का निर्माण सन् १५९२ में शुरू करवाया था.
कछवाहा वंश का शासन १२ से १८ सदी तक रहा.


कुछ ऐतिहासिक तथ्य जानिए-


सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर

Picture from wikipediaमुंडेश्वरी मंदिर 

संसार में सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर माना जाता है साथ ही भारत में सबसे प्राचीन पूर्ण जीवंत हिन्दू मंदिर भी इसी मंदिर को मानते हैं.
 आकिर्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने माना है कि इतिहास के मद्देनजर यह भारत देश का सबसे पुराना मंदिर है.

भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित इस मंदिर के पुरुत्थान के लिए योजनायें बन रही है.यूनेस्को की लिस्ट में भी शामिल करवाने के प्रयास जारी हैं.इस मंदिर के बारे में मैं यहाँ संक्षेप में जानकारी दे रही हूँ.

रानी सीपरी की मस्जिद

 गुजरात के विश्व प्रसिद्ध शहर अहमदाबाद ko 'मैनचेस्टर ऑफ ईस्ट' भी कहते हैं.
साबरमती नदी के किनारे बसे इस शहर को कर्णावती के नाम से भी जाना जाता है. इस शहर की बुनियाद सन १४११ में डाली गयी थी.
रानी सीपरी की मस्जिद
Picture is from-http://www.welcometoahmedabad.com/124/islamic-architecture.html
शहर का नाम सुलतान अहमदशाह पर पडा था.कंकरिया और वस्त्रापुर तालाब दो मुख्य झीलें हैं.
पुराने अहमदाबाद शहर के बीचों बीच बनी इस 'रानी सीपरी की मस्जिद 'प्रसिद्ध इबादतगाह को सुल्तान महमूद बेगड़ा की हिंदू रानी सीपरी ने १५१४ में बनवाया था .
यह इमारत पुरातत्व विभाव द्वारा संरक्षित है.इस मस्जिद के पास ही रानी सीपरी का मकबरा भी बना हुआ है..
इसी सुल्तान की दूसरी हिंदू रानी [धार की राजकुमारी ]रूपमती की मस्जिद और उनका मकबरा भी यहीं पास में बना हुआ है.