तमिलनाडु राज्य के ३२ जिलों में से एक है वेल्लोर या वेल्लूर ।
चेन्नई से 145 किमी. की दूरी पर पलार नदी के किनारे यह शांत एवं छोटी जगह ऐतिहासिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है.यहां कई वंशों जैसे पल्लव, चोल, नायक, मराठा, अरकोट नवाब और बीजापुरी सुल्तान ने शासन किया था.
उत्तर पूर्वी भारत में एक हरा भरा सरहदी राज्य है 'आसाम' जो मानसून और चाय के बागानों लिए प्रसिद्द है.यही बहती है ब्रह्मपुत्र नदी.प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इस स्थान को 'प्रागज्योतिषपुर' के नाम से जाना जाता था.इस राज्य की राजधानी है -गुवाहाटी
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प्राचीन मंदिरों के दर्शन आप को यहाँ होंगे.मगर यहाँ 'पिकॉक-आइलैंड 'में बने सुंदर 'शिव मंदिर 'में छेनी की धार और हाथ के कौशल से वास्तुकला के आश्चर्यजनक काम को देख कर कोई भी आश्चर्यचकित रह जायेगा.
दर्शनीय स्थल हैं--कामाख्या मंदिर,नवग्रह मंदिर,उमानन्दा मंदिर,वशिष्ठ आश्रम,असम जू एवं बॉटनिकल गार्डन्स,हाजो,पाव मक्का मस्जिद.मां भगवती कामाख्या मंदिर
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देवी भागवत पुराण में 108, कालिकापुराण में छब्बीस, शिवचरित्र में इक्यावन, दुर्गा शप्तसती और तंत्रचूड़ामणि मेंशक्ति पीठों की संख्या 52 बताई गई है.गुवाहाटी से 7 कि.मी की दूरी पर स्थित नीलांचल अथवा नीलशैल पर्वतमालाओं पर समुद्र तल से ८०० फीट ऊँचाई पर स्थित मां भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है.
मंदिर का निर्माण कब हुआ?
कोई कहता है इसे राजा नरकासुर ने बनवाया था.कोई कहता है कामदेव ने!.मगर इतिहास कहता है की वर्तमान ढांचा १५६५ में कच्छ वंश के राजा चिलाराय[?]ने बनवाया था और मुगल बादशाह औरंगजेब [?] के हमलों में यह नष्ट हो गया था .इस पुनर्निर्माण राजा नर नारायण ने १६५६ में करवाया. कामाख्या मंदिर
इस का गुम्बद मधुमक्खियों के छत्ते की भांति है। इस की शक्ती है कामाख्या और भैरव को उमानंद कहते हैं।
इस मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अतिरिक्त अन्य देवियों - काली , तारा , बगला , छिन्नमस्ता ,भुवनेस्वरी , भैरवी और धूमावती के मंदिर भी हैं.कुछ और मंदिर इसी मंदिर के काम्प्लेक्स में हैं-सीतला , ललित कांता, जय दुर्गा 'वन दुर्गा ,राजराजेस्वरी ,स्मसनाकल , अभयानंद धर्मशाला का काली मंदिर और संखेस्वरी मंदिर.कामख्या मंदिर प्रांगण में भगवान शिव के भी ५ मंदिर हैं जो उनके ५ रूप 'कामेस्वारा, सिद्धेस्वरा , अम्रतोकेस्वारा , अघ्प्रा और तत्पुरुसा 'को बताते हैं.भगवान विष्णु के ३ मंदिर भी यहीं हैं.
-मंदिर के गर्भगृह स्थित 'महामुद्रा' पर प्राकृतिक जल धारा बहती है.जिस को रेशम के परिधान और फूलों में ढका देखा जा सकता है.इनके दर्शन में आलौकिक अनुभूति होती है. -सती स्वरूपिणी आद्यशक्ति महाभैरवी कामाख्या तीर्थ को विश्व का सर्वोच्च कौमारी तीर्थ भी माना जाता है.इसीलिए इस शक्तिपीठ में कौमारी-पूजा अनुष्ठान का भी अत्यंत महत्व है
-इस स्थान को मानवता के उद्गम का केंद्र भी माना जाता है.
दर्शन हेतु मंदिर द्वार खुलने का समय-सुबह ८ से १- पुनः २.३० से
कब जाएँ- जब भी माता का बुलावा हो तब दर्शन हेतु जाएँ.
कैसे जाएँ -गुवाहाटी शहर सभी मुख्य शहरों से सड़क,वायु,रेल मार्ग से जुडा है.
मंदिर से सम्बंधित प्रचलित पुरानी कथाएँ-
१-कहा जाता है कि सती पार्वती ने अपने पिता द्वारा अपने पति, भगवान शिव का अपमान किए जाने पर हवन कुंड में कूदकर अपनी जान दे दी थी. भगवान शिव को आने में थोड़ी देर हो गई, तब तक उनकी अर्धांगिनी का शरीर जल चुका था. उन्होंने सती का शरीर आग से निकाला और तांडव नृत्य आरंभ कर दिया. अन्य देवतागण उनका नृत्य रोकना चाहते थे, अत: उन्होंने भगवान विष्णु से शिव को मनाने का आग्रह किया. भगवान विष्णु ने सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए और भगवान शिव ने नृत्य रोक दिया. कहा जाता है कि सती की योनि (सृजक अंग) गुवाहाटी में गिरी. यह मंदिर देवी की प्रतीकात्मक ऊर्जा को समर्पित है। यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है.इसका महत् तांत्रिक महत्व है.प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है.यहीं माँ भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है।
२-कामाख्या के शोधार्थी एवं प्राच्य विद्या विशेषज्ञ डॉ. दिवाकर शर्मा के अनुसार कामाख्या के बारे में किंवदंती है कि घमंड में चूर असुरराज नरकासुर एक दिन मां भगवती कामाख्या को अपनी पत्नी के रूप में पाने का दुराग्रह कर बैठा था. कामाख्या महामाया ने नरकासुर की मृत्यु को निकट मानकर उससे कहा कि यदि तुम इसी रात में नील पर्वत पर चारों तरफ पत्थरों के चार सोपान पथों का निर्माण कर दो एवं कामाख्या मंदिर के साथ एक विश्राम-गृह बनवा दो, तो मैं तुम्हारी इच्छानुसार पत्नी बन जाऊँगी और यदि तुम ऐसा न कर पाये तो तुम्हारी मौत निश्चित है। गर्व में चूर असुर ने पथों के चारों सोपान प्रभात होने से पूर्व पूर्ण कर दिये और विश्राम कक्ष का निर्माण कर ही रहा था कि महामाया के एक मायावी कुक्कुट (मुर्गे) द्वारा रात्रि समाप्ति की सूचना दी गयी, जिससे नरकासुर ने क्रोधित होकर मुर्गे का पीछा किया और ब्रह्मपुत्र के दूसरे छोर पर जाकर उसका वध कर डाला। यह स्थान आज भी [दर्रांग जिले में `कुक्टाचकि' /'kukarkata' के नाम से विख्यात है और यह सीढियाँ 'मेखेलौजा पथ' के नाम से जानी जाती हैं.
बाद में मां भगवती की माया से भगवान विष्णु ने नरकासुर असुर का वध कर दिया। नरकासुर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र भगदत्त कामरूप का राजा बना। भगदत्त का वंश लुप्त हो जाने से कामरूप राज्य छोटे-छोटे भागों में बंट गया और सामंत राजा कामरूप पर अपना शासन करने लगा।नरकासुर के नीच कार्यों के बाद एवं विशिष्ट मुनि के अभिशाप से देवी अप्रकट हो गयी थीं.
यहाँ मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण पर्व है -अम्बुवाची पर्व-: अम्बुवाची पर्व
विश्व के सभी तांत्रिकों, मांत्रिकों एवं सिद्ध-पुरुषों के लिये वर्ष में एक बार पड़ने वाला अम्बूवाची योग पर्व वस्तुत एक वरदान है. यह अम्बूवाची पर्वत भगवती (सती) का रजस्वला पर्व होता है. पौराणिक शास्त्रों के अनुसार सतयुग में यह पर्व 16 वर्ष में एक बार, द्वापर में 12 वर्ष में एक बार, त्रेता युग में 7 वर्ष में एक बार तथा कलिकाल में प्रत्येक वर्ष जून माह में तिथि के अनुसार मनाया जाता है. साल २००८ में अम्बूवाची योग पर्व जून की 22, 23, 24 तिथियों में मनाया गया.
पौराणिक सत्य है कि अम्बूवाची पर्व के दौरान माँ भगवती रजस्वला होती हैं और मां भगवती की गर्भ गृह स्थित महामुद्रा (योनि-तीर्थ) से निरंतर तीन दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है. यह अपने आप में, इस कलिकाल में एक अद्भुत आश्चर्य का विलक्षण नजारा है. कामाख्या तंत्र के अनुसार -
योनि मात्र शरीराय कुंजवासिनि कामदा। रजोस्वला महातेजा कामाक्षी ध्येताम सदा।।
इस बारे में `राजराजेश्वरी कामाख्या रहस्य' एवं `दस महाविद्याओं' नामक ग्रंथ के रचयिता एवं मां कामाख्या के अनन्य भक्त ज्योतिषी एवं वास्तु विशेषज्ञ डॉ. दिवाकर शर्मा ने बताया कि अम्बूवाची योग पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भगृह के कपाट स्वत ही बंद हो जाते हैं और उनका दर्शन भी निषेध हो जाता है. इस पर्व की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे विश्व से इस पर्व में तंत्र-मंत्र-यंत्र साधना हेतु सभी प्रकार की सिद्धियाँ एवं मंत्रों के पुरश्चरण हेतु उच्च कोटियों के तांत्रिकों-मांत्रिकों, अघोरियों का बड़ा जमघट लगा रहता है। तीन दिनों के उपरांत मां भगवती की रजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है।
आद्य-शक्ति महाभैरवी कामाख्या के दर्शन से पूर्व महाभैरव उमानंद, जो कि गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भाग में टापू के ऊपर स्थित है, का दर्शन करना आवश्यक है. यह एक प्राकृतिक शैलदीप है, जो तंत्र का सर्वोच्च सिद्ध सती का शक्तिपीठ है. इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि से जाग्रत होने पर सदाशिव ने उसे भस्म कर दिया था. भगवती के महातीर्थ (योनिमुद्रा) नीलांचल पर्वत पर ही कामदेव को पुन जीवनदान मिला था. इसीलिए यह क्षेत्र कामरूप के नाम से भी जाना जाता है.
जिस प्रकार उत्तर भारत में कुंभ महापर्व का महत्व माना जाता है,ठीक उसी प्रकार उससे भी श्रेष्ठ इस आद्यशक्ति के अम्बूवाची पर्व का महत्व है. इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की दिव्य आलौकिक शक्तियों का अर्जन तंत्र-मंत्र में पारंगत साधक अपनी-अपनी मंत्र-शक्तियों को पुरश्चरण अनुष्ठान कर स्थिर रखते हैं. इस पर्व में मां भगवती के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह स्थित महामुद्रा पर सफेद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, जो कि रक्तवर्ण हो जाते हैं. मंदिर के पुजारियों द्वारा ये वस्त्र प्रसाद के रूप में श्रद्धालु भक्तों में विशेष रूप से वितरित किये जाते हैं. इस पर्व पर भारत ही नहीं बल्कि बंगलादेश, तिब्बत और अफ्रीका जैसे देशों के तंत्र साधक यहां आकर अपनी साधना के सर्वोच्च शिखर को प्राप्त करते हैं. वाममार्ग साधना का तो यह सर्वोच्च पीठ स्थल है. मछन्दरनाथ, गोरखनाथ, लोनाचमारी, ईस्माइलजोगी इत्यादि तंत्र साधक भी सांवर तंत्र में अपना यहीं स्थान बनाकर अमर हो गये हैं.
खबरों में-
१-उचित देखरेख के अभाव में प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर समेत असम के कई पुराने मंदिरों का ढाँचा कमजोर हो रहा है.
आस्था और अंधविश्वास के आगे इन मंदिरों का पुरातात्विक महत्व लुप्त होता जा रहा है.
२ -हर साल जून मास में लगने वाले मेले में निसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति हेतु आशीर्वाद लेने भी आते हैं.
३-यहाँ दी जाने वाली पशु बलि के विरुद्ध पशु प्रेमी संस्थानों ने अपनी चिंता जतायी है.
भारत के पश्चिमी तट पर स्थित राज्य गोवा का नाम जब भी सुनते हैं तो वहां के मनोरम समुद्र तट का ध्यान हो आता है.देशी-विदेशी सेलानियों में बेहद लोकप्रिय पर्यटन स्थल.
गोवा में सिर्फ समुद्री तट नहीं हैं और भी बहुत कुछ ऐसा है जो पुरातत्व और इतिहास की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है.यूँ तो आप को गोवा के बारे में बहुत सारी जानकारी अंतरजाल पर मिल जायेगी.यहाँ मेरा प्रयास है कि आप को संक्षेप में अधिक से अधिक जानकारी दे सकूँ.
गोवा को ३० मई १९८७ भारत के २५वे राज्य का दर्जा दिया गया.
वर्तमान में प्रशासनिक दृष्टि से गोआ को उत्तरी गोआ और दक्षिणी गोआ में बांटा गया है. उत्तरी गोआ का मुख्यालय पणजी है जबकि दक्षिणी गोआ का मुख्यालय मडगांव में है
जानते हैं गोवा का प्राचीन इतिहास -:
महाभारत में जिस गोपराष्ट्र [ गायों को चराने वाला क्षेत्र ]का उल्लेख मिलता है वही तो है गोवा!
दक्षिण कोंकण क्षेत्र का उल्लेख गोवाराष्ट्र के रूप में पाया जाता है. संस्कृत के कुछ अन्य पुराने स्त्रोतों में गोआ को गोपकपुरी और गोपकपट्टनकहा गया है जिनका उल्लेख अन्य ग्रंथों के अलावा हरिवंशम और स्कंद पुराण में मिलता है. गोवा को बाद में कहीं कहीं गोअंचलभी कहा गया है.
जनश्रुति के अनुसार गोआ जिसमें कोंकण क्षेत्र भी शामिल है (और जिसका विस्तार गुजरात से केरल तक बताया जाता है) की रचना भगवान परशुराम ने की थी। कहा जाता है कि परशुराम ने एक यज्ञ के दौरान अपने वाणो की वर्षा से समुद्र को कई स्थानों पर पीछे धकेल दिया था और लोगों का कहना है कि इसी वजह से आज भी गोआ में बहुत से स्थानों का नाम वाणावली, वाणस्थली इत्यादि हैं.
उत्तरी गोवा में हरमल के पास आज भूरे रंग के एक पर्वत को परशुराम के यज्ञ करने का स्थान माना जाता है।अन्य नामों में गोवे, गोवापुरी, गोपकापाटन, औरगोमंत प्रमुख हैं. टोलेमी ने गोआ का उल्लेख इसवी सन 200 के आस-पास गोउबा के रूप में किया है,ऐसा भी इतिहास कहता है कि अरब के मध्युगीन यात्रियों ने इस क्षेत्र को चंद्रपुर और चंदौर के नाम से अपने यात्रा वर्णन में उल्लेख किया है और इस स्थान का नाम पुर्तगाल के यात्रियों ने गोआ रखा वास्तव में वह आज का छोटा सा समुद्र तटीय शहर गोवा-वेल्हा है. बाद मे उस पूरे क्षेत्र को गोआ कहा जाने लगा जिस पर पुर्तगालियों ने कब्जा किया. दिसम्बर १९६१ में भारतीय फौजों ने इसे आजाद कराया था.
अरब सागर के तट पर बसा यह स्थान एक और महारष्ट्र दूसरी और से कर्नाटका से लगा हुआ है. यहाँ रहने वाले गोवन लोग अपने स्वछन्द विचारों ,हंसमुख स्वभाव के कारण दूसरो के साथ बहुत जल्दी घुल मिल जाते हैं.
गोवा में पर्यटन स्थल-
१-समुद्री तट-
दक्षिण में मजोर्दा , बेताल्बतिम , कालवा , बेनौलिम , वरचा , कावेलोस्सिम और पालोलेम -और पूर्वोत्तर में अरम्बोल , मंद्रेम , मोर्जिम , वगाटर , अंजुना , बागा , कालान्गुते , सिंकुएरिम , मिरामार प्रमुख तट हैं.
2-बोंडला अभ्यारण्य, कावल वन्य प्राणी अभ्यारय, कोटिजाओ वन्यप्राणी अभ्यारण्य,भगवान महावीर वन्य पशु रक्षित वन,सलीम अली पक्षी रक्षित केंद्र भी जरुर देखने जाएँ.
3-मंदिरों में-
५०० साल पुराना मंदिर 'श्री भगवती',कामाक्षी,कालिकादेवी ,श्री दामोदर मंदिर, पांडुरंग मंदिर, महालसा मंदिर,१३वि शताब्दी का महादेव मंदिर,महालक्ष्मी,गणेश,मल्लिकार्जुन,श्री मंगेश मंदिर, रामनाथ का मंदिर, शांता दुर्गा मंदिर, गोपाल-गणेश का मंदिर आदि कई मंदिरों में एक पांचवी सदी में बना ब्रम्हा मंदिर भी उल्लेखनीय है .
प्रत्येक मंदिर स्वच्छ सुंदर तालाब , दीप स्तंभ, और आकर्षक परिसरों से युक्त हैं.
शांता दुर्गा गोवा निवासियों की ख़ास देवी हैं, कहते हैं कि बंगाल की क्षुब्धा दुर्गा गोवा में आकर शांत हो गईं और शांता दुर्गा के नाम से पूजी जाने लगीं. शांता दुर्गा का मंदिर पोंडा से ही तीन कि.मी. दूर कवले गाँव में है.
4-मस्जिद- सांगेगाँव की जामा मस्जिद और पोंडागाँव की १५ वि शताब्दी में बीजापुर के आदिलशाह द्वारा बनवाई साफा मस्जिद भी बहुत बड़ी और लोकप्रिय स्थलों में से एक है.
5- किलों में-
भाग्वाद का किला , रेयश मागुश का किला ,तेरे खोल का किला,कामसुख का किला दर्शनीय हैं.
6-
पुराने गोवा की तरफ आप जाएँ तो आप को बहुत से चर्च देखने को मिलेंगे यह स्थान एक हेरिटेज साईट है. पुराने गोवा के गिरजाघर सोलहवीं शताब्दी में निर्मित हुए हैं,पणजी-पोंडा मुख्य मार्ग पर एक ओर पुर्तगाल के महान कवि तुईशद कामोंइश का विशाल पुतला खड़ा है, तो दूसरी ओर महात्मा गांधी की भव्य प्रतिमा देखते ही बनती है.
प्राचीन और विशाल पुर्तगाली कला का प्रभाव लिए इनकी शिल्पकला मनमोह लेती है. प्रमुख गिरिजाघरों में से एक हैं -बासिसलका बॉम जीसस गिरजाघर जहाँ विख्यात संत फ्रांसिस जेवियर का शव ४०० साल से सुरक्षित रखा हुआ है.साल में एक बार इसे जनता के दर्शनार्थ रखा जाता है.
दूसरा प्रमुख चर्च है-सा कैथेड्राल चर्च--यहाँ का आकर्षण सोने की बनी बहुत बड़ी घंटी है.
इस के अलावा-संत फ्रांसिस आसिसी चर्च भी बहुत खूबसूरत है.
संत काटेजान चर्च के प्रवेशद्वार को कहा जाता है कि आदिलशाह के शासनकाल में क़िले का दरवाज़ा था.
इन सभी के अतिरिक्त भी कई प्राचीन चर्च हैं जो आप को वहां देखने को मिलेंगे .
7-दूध सागर जल प्रपात,सांखली गाँव में हरवलें जल प्रपात , मायम झील मनोरम स्थल हैं.
8-एक रिकॉर्ड के अनुसार गोवा में लगभग २५ मानव निर्मित गुफाएं अब तक खोजी गयीं हैं.
प्राकृतिक गुफाओं में 'वेरना गुफा 'सब से बड़ी है जिस में करीब १२०० लोगों को एकत्र किया जा सकता है.
Few Pictures Of Goa from the Album of Mr.Srikant [Pune]-
[Thanks a lot Srikant for these lovely pictures]
अर्वालम की [मानव निर्मित]गुफाएं -
ये गुफाएं उत्तरी गोवा में Bicholim से 9 किलोमीटर दूर स्थित हैं.
गुफाओं के बाहर लगे पुरातत्व विभाग के सूचना पट के अनुसार ये गुफाएं ६-७ वि सदी में बनाई हुई लगती हैं. भारतीय पुरातत्व विभाग की दी जानकारी के अनुसार यहाँ दो मुख्य गुफाएं और एक आवासीय स्थल पाए गए हैं.
अर्वालम गुफा के काम्प्लेक्स में में ५ कक्ष हैं [हर कक्ष में एक शिवलिंग है.] और बीच के कक्ष में बने शिवलिंग की बहुत मान्यता है.बाकि चार शिवलिंगों की रचना बहुत कुछ एल्लोरा और elphanta की गुफाओं में मिले शिवलिंगों जैसी है.इन पर संस्कृत और ब्राह्मी में लिखा हुआ है जो बताते हैं कि ये ७वि सदी के शुरू के काल में निर्मित हुए.
[Watch Aravalem caves' video clip.you can see all shivlings in this clip]-:
ऐसा कहा जाता है कि पांडव अपने अज्ञात वास के दौरान इन गुफाओं में ठहरे थे .कुछ इन्हें बोद्धों द्वारा बनाया भी मानते हैं .बहुत सी जगह इन गुफाओं को पांडवों की गुफा भी कहा गया है.मगर अधिकारिक नाम अर्वालम गुफाएं ही है.
घने जंगलों के बीच बनी इस गुफा के पांचों दरवाजों पर पुरातत्व विभाव ने Fence लगायी हुई है .
दिन के समय भी यह जगह थोडा भय देती है क्योंकि भालू ,चीते आदि जानवरों के आस पास हो सकने की चेतावनी bhi दी जाती है. यहीं पास में अर्वालम जल प्रपात भी है.इस जल प्रपात के पास रुद्रेश्वर मंदिर भी है.
अर्वालम जल प्रपात kee video clip-:
कैसे जाएँ--
गोवा जाने के लिए सभी मुख्य शहरों से रेल,सड़क,वायु मार्ग से सुविधाएँ उपलब्ध हैं.मुंबई से गोआ के लिए प्रतिदिन बसें चलती हैं.
सन २०१० में विश्व सांस्कृतिक निकाय यूनेस्को ने जयपुर के 18 वीं सदी के जंतर-मंतर को वर्ल्ड हैरिटेज सूची में शामिल किया है.तब से ही यह राजस्थान की पहली व देश की २३ वीं सांस्कृतिक धरोहर बन गया है.यूँ तो राजस्थान का भरतपुर घना पक्षी अभयारण्य पहले से वर्ल्ड हैरिटेज की सूची में है,परंतु वह प्राकृतिक हैरिटेज सूची में है.ज्ञात हो कि देश की अब तक २८ विश्व धरोहर हैं, जिनमें अब २३ सांस्कृतिक और ५ प्राकृतिक धरोहर हैं.
आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में घने जंगलों के बीच कृष्णा नदी [पाताल गंगा] के दायीं ओर स्थित यह एक अति प्राचीन स्थल मल्लिकार्जुन मंदिर है .श्री शैलम पर्वत पर बने इस मल्लिकार्जुन मंदिर में ही स्थापित है बारह ज्योतिर्लिंगों में चौथा स्थान रखने वाला मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग.
भगवान मल्लिकार्जुन का यह देव स्थान नाल्लामलाई पर्वत पर स्थित है.नल्ला का अर्थ है--अच्छा और माला का अर्थ है पहाड़ी.
आज किसी स्थान के बारे में नहीं जानकारी नहीं दी जा रही है.आज बस दो बातें....
भारत के विभिन्न पर्यटक स्थलों की हिंदी में सचित्र व् संतुलित जानकारी देना इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य है.
भारत विविधता से परिपूर्ण देश है ,यहाँ इतने दर्शनीय स्थल हैं कि उन्हें देखने के लिए एक जीवन भी कम पड़े.अक्सर भीड़ भाड़ वाले और जाने -माने स्थलों पर ही लोग घूमने जाते हैं जबकि हमारे देश में एक से बढ़कर एक प्राकृतिक सुंदरता से ओत -प्रोत स्थल हैं ,कई वर्षों के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए कितने ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैं जो अधिक प्रचलित नहीं हैं मगर दर्शनीय हैं.ऐसे सभी स्थलों की खोज करना ,उनके बारे में तथ्य जुटाना और आप के समक्ष प्रस्तुत करने के मेरे प्रयास हैं.
१ जुलाई ,२००९ को इस ब्लॉग पर पहली पोस्ट लगाई गयी थी .इस तरह इस माह इस ब्लॉग को बने पूरे दो साल हो गए हैं.
यह समय कितनी तेज़ी से गुज़र गया , मालूम ही नहीं चला.
इस ब्लॉग की परिकल्पना श्री प्रकाश गोविंद जी ने की थी,उन्होंने मेरी अनुवाद करने की क्षमता का अनुमान मेरे द्वारा ताऊ पहेली व अन्य पहेलियों के जवाब में दी जाने वाली जानकारियों के आधार पर लगाया. उन्होंने मुझे सुझाव दिया कि मुझे एक ब्लॉग बनाकर वहाँ केवल भारत के पर्यटक स्थलों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी जुटा कर हिंदी में लिखना चाहिए क्योंकि अंतर्जाल पर इस तरह की अधिक जानकारी सिर्फ अंग्रेज़ी में है .
बहुत समय पहले इस मंदिर पर यह जानकारी एकत्र की थी ,आज इस मंदिर को उसके खजाने के लिए चर्चा में देख -सुन कर सोचा कि इस जानकारी को आप सब के साथ बाँटा जाये.
ज्ञात हो कि विकिपीडिया पर दी गयी हिंदी में इस स्थान के बारे में जानकारी मेरी ही लिखी हुई है.जिसे मैंने कुछ साल पहले अंतर्जाल पर पोस्ट किया था.जिन्होंने भी मेरी लिखी इस जानकारी को चित्रों सहित विकिपीडिया पर डाला है ,उनका धन्यवाद.
महाराजा सवाई जयसिंह [द्वितीय] का एक खगोलशास्त्री के रूप में परिचय-
राजा जय सिंह प्रथम के पोते राजा सवाई जय सिंह [द्वितीय ] [१६६६-१७४३]बहुत ही छोटी सी उम्र से गणित में बहुत ही अधिक रूचि रखते थे.उनकी औपचारिक पढ़ाई ११ वर्ष की आयु में छूट गयी क्योंकि उनकी पिताजी की मृत्यु के बाद उन्हें ही राजगद्दी संभालनी पड़ी थी.
जनवरी २५,सन् १७०० में गद्दी संभालने के बाद भी उन्होंने अपना अध्ययन नहीं छोडा.उन्होंने बहुत खगोल विज्ञानं और ज्योतिष का भी गहरा अध्ययन किया.उन्होंने अपने कार्यकाल में बहुत से खगोल विज्ञान से सम्बंधित यंत्र एवम पुस्तकें भी एकत्र कीं. उन्होंने प्रमुख खगोलशास्त्रियों को विचार हेतु एक जगह एकत्र भी किया.हिन्दू ,इस्लामिक और यूरोपीय खगोलशास्त्री सभी ने उनके इस महान कार्य में अपना बराबर योगदान दिया.
कर्णाटक में मेंगलोर से १६५ किलो मीटर दूर उत्तर कन्नडा की भटकल तहसील में यह मंदिर अरब सागर के बहुत ही सुन्दर एवं शांत तट के किनारे बना हुआ है.
मुरुदेश्वर बीच [समुद्र तट]कर्णाटक के सब से सुन्दर तटों में से एक है .पर्यटकों के लिए यहाँ आना दोहरा लाभ देता है एक और इस धार्मिक स्थल के दर्शन और दूसरी तरफ प्राकृतिक सुन्दरता का नज़ारा भी हो जाता है.
कन्दुका पहाड़ी पर ,तीन ओर से पानी से घिरा यह मुरुदेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है.यहाँ भगवान शिव का आत्म लिंग स्थापित है.जिस की कथा रामायण काल से है.अमरता पाने हेतु रावण जब शिव जी को प्रसन्न करके उनका आत्मलिंग अपने साथ लंका ले जा रहा था.तब रास्ते में इस स्थान पर आत्मलिंग धरती पर रख दिए जाने के कारण स्थापित हो गया था.गुस्से में रावण ने इसे नष्ट करने का प्रयास किया उस प्रक्रिया में , जिस वस्त्र से आत्म लिंग ढका हुआ था वह म्रिदेश्वर [अब मुरुदेश्वर कहते हैं ]में जा गिरा .इस की पूरी कथा आप सब को मालूम ही होगी