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आज महाराणा प्रताप की जयंती पर चलिये कुम्भलगढ़

महाराणा प्रताप (९ मई, १५४०- १९ जनवरी, १५९७) उदयपुर, मेवाड में शिशोदिया राजवंश के राजा थे. हिंदू कलेंडर के अनुसार उनका जन्म ज्येष्ठ शुक...

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कुंभ नगरी -नाशिक

नासिक [महाराष्ट्र ] -:

गोदावरी नदी के तट पर स्थित यह नगर हिन्दू तीर्थ यात्रियों के लिए प्रमुख है.महाराष्ट्र राज्य में यह शहर मुम्बई से लगभग  170  किमी और पुणे से २०५ किमी दूर है.पुराणों के अनुसार यह वह पावन धरती है जहां भगवान राम, सीता और रामानुज के पतितपावन चरण पडे हैं राम घाट पर कहते हैं स्वय भगवान राम ने डुबकी लगाई थी.

यहाँ बहुत से सुंदर मंदिर और घाट हैं,त्योहारों के समय बहुत रौनक रहती है.अंगूर और सतंरों के मामले में नासिक हिन्दुस्तान का सबसे बडा केन्द्र बताया जाता है.

नाशिक शक्तिशाली सातवाहन वंश के राजाओं की राजधानी थी. मुगल काल में इस शहर को गुलशनबाद के नाम से जाना जाता था.डॉ. अम्बेडकर ने १९३२ में नाशिक में अस्पृश्यता आंदोलन और जन आंदोलन चलाया था.

रणकपुर जैन मंदिर- खूबसूरत कारीगरी


रणकपुर में ऋषभदेव का चतुर्मुखी जैन मंदिर-:

राजस्थान में पाली जिले में स्थित रणकपुर जैन समुदाय के पाँच पवित्र स्थानों में से एक है.

यह स्थान उदयपुर से ९६ किलोमीटर दूर है मगर अधिकतर लोग इसे उदयपुर की ही धरोहर मानते हैं.
इसका निर्माण कार्य राणा कुम्भा के शासन काल में ,1446 विक्रम संवत में शुरू होकर 50 वर्षों से अधिक समय तक चला.

निर्माण में लागत आई---उस समय का लगभग 99 लाख रुपये.

मंदिर की विशेषताओं पर एक नज़र---

तमिलनाडु का स्वर्ण मंदिर

तमिलनाडु राज्य के ३२ जिलों में से एक है वेल्लोर या वेल्लूर ।



चेन्नई से 145 किमी. की दूरी पर पलार नदी के किनारे यह शांत एवं छोटी जगह ऐतिहासिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है.यहां कई वंशों जैसे पल्लव, चोल, नायक, मराठा, अरकोट नवाब और बीजापुरी सुल्तान ने शासन किया था.

यहाँ का 'वेल्लोर किला' बहुत प्रसिद्द है।

तमिलनाडु का स्वर्ण मंदिर

मां भगवती कामाख्या मंदिर-[आसाम]


उत्तर पूर्वी भारत में एक हरा भरा सरहदी राज्य है 'आसाम' जो मानसून और चाय के बागानों लिए प्रसिद्द है.यही बहती है ब्रह्मपुत्र नदी.प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इस स्थान को 'प्रागज्योतिषपुर' के नाम से जाना जाता था.इस राज्य की राजधानी है -गुवाहाटी
.
प्राचीन मंदिरों के दर्शन आप को यहाँ होंगे.मगर यहाँ 'पिकॉक-आइलैंड 'में बने सुंदर 'शिव मंदिर 'में छेनी की धार और हाथ के कौशल से वास्तुकला के आश्चर्यजनक काम को देख कर कोई भी आश्चर्यचकित रह जायेगा.

श्रीशैल देवस्थान-[भाग-११]- [मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग]

जैसे कि हम अब तक १० ज्योतिर्लिंगों की सैर कर चुके हैं आज हम ग्यारहवें ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन के दर्शन हेतु चलेंगे.

श्रीशैल देवस्थान-

आंध्र प्रदेश  के कुरनूल जिले में घने जंगलों के बीच कृष्णा  नदी [पाताल गंगा] के दायीं ओर स्थित यह एक अति प्राचीन स्थल मल्लिकार्जुन मंदिर है .श्री शैलम पर्वत पर बने इस मल्लिकार्जुन मंदिर में ही स्थापित है बारह ज्योतिर्लिंगों में चौथा स्थान रखने वाला मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग.
भगवान मल्लिकार्जुन का यह देव स्थान नाल्लामलाई पर्वत पर स्थित है.नल्ला का अर्थ है--अच्छा   और माला का अर्थ है पहाड़ी.

सबसे धनवान मंदिर- श्री पद्मनाभास्वामी मंदिर,तिरूवनंतपुरम

श्री पद्मनाभास्वामी मंदिर,तिरूवनंतपुरम[केरल]
बहुत समय पहले इस मंदिर पर यह जानकारी एकत्र की थी ,आज इस मंदिर को उसके खजाने के लिए चर्चा में देख -सुन कर सोचा कि इस जानकारी को आप सब के साथ बाँटा जाये.

मुरुदेश्वर मंदिर ,कर्णाटक

मुरुदेश्वर मंदिर [कर्नाटक]
कर्णाटक में मेंगलोर से १६५ किलो मीटर दूर उत्तर कन्नडा की भटकल तहसील में यह मंदिर अरब सागर के बहुत ही सुन्दर एवं शांत तट के किनारे बना हुआ है.

मुरुदेश्वर बीच [समुद्र तट]कर्णाटक के सब से सुन्दर तटों में से एक है .पर्यटकों के लिए यहाँ आना दोहरा लाभ देता है एक और इस धार्मिक स्थल के दर्शन और दूसरी तरफ प्राकृतिक सुन्दरता का नज़ारा भी हो जाता है.



कन्दुका पहाड़ी पर ,तीन ओर से पानी से घिरा यह मुरुदेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है.यहाँ भगवान शिव का आत्म लिंग स्थापित है.जिस की कथा रामायण काल से है.अमरता पाने हेतु रावण जब शिव जी को प्रसन्न करके उनका आत्मलिंग अपने साथ लंका ले जा रहा था.तब रास्ते में इस स्थान पर आत्मलिंग धरती पर रख दिए जाने के कारण स्थापित हो गया था.गुस्से में रावण ने इसे नष्ट करने का प्रयास किया उस प्रक्रिया में , जिस वस्त्र से आत्म लिंग ढका हुआ था वह म्रिदेश्वर [अब मुरुदेश्वर कहते हैं ]में जा गिरा .इस की पूरी कथा आप सब को मालूम ही होगी

द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-१० ]- घुश्मेश्वर/घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

द्वादश ज्योतिर्लिंग में अब तक हम ने ९ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किये.अप्रैल २००९ , के बाद आज मैं इस की अगली कड़ी प्रस्तुत कर पा रही हूँ.प्रयास रहेगा कि जल्द ही यह श्रृंखला पूरी कर सकूँ.
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घुश्मेश्वर/घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग –[महाराष्ट्र ]
महाराष्ट्र के मनमाड से 100 किमी दूर दौलताबाद स्टेशन से लगभग ११ किमी की दूरी पर वेरुल गांव में स्थित हैं.विश्व प्रसिद्ध एलोरा की गुफाएं भी पास में ही स्थित हैं.

छत्तीसगढ़ का खजुराहो

भारत के राज्य छत्तीसगढ़ के  बारे में हम आप को अपनी पुरानी पोस्ट में बता चुके हैं.
इसी राज्य के एक जिले कबीरधाम [पुराना नाम कवर्धा ]में आज आप को लिए चलते हैं जो रायपुर से करीब 100 किमी दूर है.
यह स्थान राज्य के मुख्यमंत्री डॉ.  रमण सिंह जी का गृह जिला भी है.पिछड़ा समझे जाने वाले इस राज्य ने कम समय में अपनी मजबूत अंतर्राष्ट्रीय छवि बनाई है.यहाँ पर्यटक भारी संख्या में घूमने आते हैं.

द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-9]- त्रयम्बकेश्वर

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त्रयम्बकेश्वर-:
Tryambakeshwar Temple, NasikTryambakeshwar Temple
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक'त्रयम्बकेश्वर 'महाराष्ट्र के नासिक में है.
नाशिक शहर से ४० कि.मी दूर एक छोटे से कस्बे त्रयम्बकेश्वर में ,गोदावरी नदी के किनारे भगवान शंकर का यह ज्योतिर्लिंग है.भक्ति और आस्था के इस पावन स्थल में [धार्मिक मान्यता के अनुसार] काल सर्प योग के प्रकोप से मुक्ति पाने के लिए लोग दूर दूर से यहाँ आते हैं.

द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-8]- भीमशंकर




महाराष्ट्र राज्य में मुंबई से करीब 265 किलोमीटर [via Pune] दूर, पूर्व की ओर भीमा नदी के तट पर भीमशंकर ज्योतिर्लिग स्थित है.
इसके उद्भव की एक कथा इस प्रकार है-
सहमाद्रि पर्वत के शिखर पर स्थित इस ज्योतिर्लिंग का पुराणों में बहुत अधिक महत्व है। आकर्षक हरियाली से घिरे इस तीर्थस्थल तक पहुंचने के लिए बसों का सहारा लेना पड़ता है। पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार कुंभकरण का बेटा भीम ब्रहृमा के वर से इतना वलशाली हो गया कि उसने सभी देवताओं को हराकर इंद्र को भी परास्त कर दिया। इसके बाद उसने कामरूप के महाराजा सुर्दाक्षण को भी अपने कब्जे में कर लिया। सुर्दाक्षण शिवभक्त थे। उन्होंने कारागार में ही शिवलिंग बनाकर तपस्या शुरू कर दी। भीम ने क्रुद्ध होकर उस ज्योतिर्लिंग को तोडऩा चाहा जिससे रुष्ट होकर शिवजी प्रकट हुए और भीम का बध कर दिया तथा वहीं स्थापित हो गए। जिसके कारण इस ज्योतिर्लिंग को लोग भीमशंकर के नाम से जानते हैं।
दूसरी कथा इस प्रकार-:
सहृयाद्रि और इसके आस-पास के लोगों को त्रिपुरासुर नामक दैत्‍य अपनी असुरी शक्तियों से बहुत सताता था। इस दैत्‍य से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शंकर यहाँ भीमकाय स्‍वरूप में प्रकट हुए। त्रिपुरासुर को युद्ध में पराजित करने के बाद भक्‍तों के आग्रह पर भगवान शंकर वहाँ ज्‍योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए। कहते है कि युद्ध के बाद भगवान शंकर के तन से जो पसीना बहा उस पसीने से वहाँ पर भीमवती नदी का जन्‍म हुआ।
नाना फदनिस [पेशवा ] जी ने यहाँ वर्तमान मंदिर बनवाया था.इसका प्रवेश द्वार लकड़ी का बना हुआ है.
[विभिन्न मतों के अनुसार --शिवपुराण की एक कथा के आधार पर भीमशङ्कर ज्योतिर्लिङ्ग असम के कामरूप जिले में गोहाटी के पास ब्रह्मपुर पहाड़ी पर स्थित बतलाया जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि नैनीताल जिले के काशीपुर नामक स्थान में एक विशाल शिवमंदिर है, वहीं भीमशंकर का स्थान है]

द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-७]-ओंकारेश्वर

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अपनी इस यात्रा में आज चलते हैं ओंकारेश्वर नगरी .नर्मदा क्षेत्र में यह ओंकारेश्वर सर्वश्रेष्ठ तीर्थ माना जाता है.मध्य प्रदेश के खंडवा जिले को दक्षिण भारत का प्रवेशद्वार कहा जाता है.यह जिला नर्मदा और ताप्‍ती नदी घाटी के मध्य बसा है.इंदौर शहर से ७७ किलोमीटर दूर,खंडवा जिले में स्थित यह स्थान नर्मदा के दो धाराओं में विभक्त हो जाने से बीच में बने एक टापू पर है, इसे मान्धाता पहाड़ी भी कहा जाता है. नदी की एक धारा इस पर्वत के उत्तर और दूसरी दक्षिण होकर बहती है.

द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-6]-महाकालेश्वर

ऊँ महाकाल महाकाय, महाकाल जगत्पते।
महाकाल महायोगिन्महाकाल नमोऽस्तुते॥
- महाकाल स्त्रोत(महाकाय, जगत्पति, महायोगी महाकाल को नमन)
आज महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए चलते हैं.मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित ‘दक्षिणमुखी’ इस ज्योतिर्लिंग को स्वयंभू माना जाता है.

'उज्जैन' भारत के मध्य प्रदेश राज्य के मध्य में शिप्रा नदी के किनारे बसा एक अत्यन्त प्राचीन[ पाँच हजार सालसे भी अधिक पुराना] शहर है .
जो कभी राजा विक्रमादित्य [(जिनके नाम से विक्रम संवत चलाया गया]के राज्य की राजधानी थी.
यह एक प्रमुख धार्मिक शहर है जिसे हरिशचन्द्र की मोक्षभूमि, सप्तर्षियों की र्वाणस्थली, महर्षि सान्दीपनि कीतपोभूमि, श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली, भर्तृहरि की योगस्थली, सम्वत प्रवर्त्तक सम्राट विक्रम की साम्राज्य धानी, महाकवि कालिदास की प्रिय नगरी, विश्वप्रसिद्ध दैवज्ञ वराह मिहिर की जन्मभूमि, जो अवन्तिका अमरावतीउज्जयिनी कुशस्थली, कनकश्रृंगा, विशाला, पद्मावती, उज्जयिनी आदि नामों से समय-समय पर प्रसिद्धिमिलतीरही

द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-५]-नागेश्वर

गुजरात के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद आज यहीं नज़दीक द्वारकापुरी से लगभग 17 मील की दूरी पर 'नागेश्वर मंदिर'चलते हैं .गुजरात राज्य के बारे में संक्षिप्त जानकारी मेरी पिछली पोस्ट में आप यहाँ पढ़ सकते हैं.
'एतद् यः श्रृणुयान्नित्यं नागेशोद्भवमादरात्‌। सर्वान्‌ कामानियाद् धीमान्‌ महापातकनाशनम्‌॥'
अर्थात जो श्रद्धापूर्वक इसकी उत्पत्ति और माहात्म्य की कथा सुनेगा वह सारे पापों से छुटकारा पाकर समस्त सुखों का भोग करता हुआ अंत में भगवान्‌ शिव के परम पवित्र दिव्य धाम को प्राप्त होगा. रुद्र संहिता शिव भगवान को दारुकावने नागेशं कहा गया है.नागेश्वर का अर्थ है नागों का ईश्वर होता. गुजरात प्रांत में द्वारका पुरी से लगभग 17 मील की दूरी पर यह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग 'नागेश्वर मंदिर' में स्थित है.इस दिव्य ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति और माहात्म्य की कथा आप ने सुनी होगी,जिन्हें नहीं मालूम उनके लिए बता देती हूँ.

द्वादश ज्योतिर्लिंग- [भाग-4]- काशी विश्वेश्वर

भारत के उत्तर में जनसँख्या की हिसाब से सब से बड़ा प्रदेश है उत्तर प्रदेश.उत्तर प्रदेश का ज्ञात इतिहास लगभग ४००० वर्ष पुराना है,जब आर्यों ने अपना पहला कदम इस जगह पर रखा तब वेदिक सभ्यता का उत्तर प्रदेश मे जन्म हुआ.इन्ही आर्यों के नाम पर भारत देश का नाम आर्यावर्त या भारतवर्ष पड़ा था.[भरत आर्यों के एक प्रमुख राजा थे].
मथुरा शहर में जन्मे थे भगवान कृष्ण और भगवान राम" का प्राचीन राज्य कौशल इसी क्षेत्र में था.संसार के प्राचीनतम शहरों में एक माना जाने वाला वाराणसी शहर भी यहीं है.
इस के उत्तर में हिमालय का क्षेत्र -मध्य में गंगा का मैदानी भाग -दक्षिण का विन्ध्याचल क्षेत्र है.यह सबसे अधिक '७१' जिलों वाला प्रदेश है.एशिया का सबसे बड़ा उच्‍च न्‍यायालय इलाहाबाद में है.सोनभद्र जिला, देश का एक मात्र ऐसा जिला है जिसकी सीमाएँ सर्व चार प्रदेशों को छूती हैं.

द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-3]-वैद्यनाथधाम

झारखंड-
अपने नाम के अनुरुप यह मूलत: एक वनप्रदेश है.प्रचुर मात्रा में खनिज की उपलबध्ता के कारण इसे भारत का 'रूर' भी कहा जाता है.
15 नवंबर,2000 [ आदिवासी नायक बिरसा मुंडा के जन्मदिन] के दिन बना यह राज्य भारत का अठ्ठाइसवाँ राज्य है.इसे बिहार के दक्षिणी हिस्से को विभाजित कर के बनाया गया है.इसकी राजधानी रांची है.रांची के अतिरिक्त जमशेदपुर, धनबाद तथा बोकारो जैसे औद्योगिक केन्द्रों के कारण इसे अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली हुई है.
इस राज्य में 24 जिले हैं . यह आदिवासी बहुल राज्य है.सबसे बड़ा त्योहार सरहुल है जो मुख्यतः बसंतोत्सव है .छऊ प्रसिद्द लोक नृत्य है.
पूरे भारत देश में वनों के अनुपात में यह प्रदेश एक अग्रणी राज्य माना जाता है तथा वन्यजीवों के संरक्षण के लिये मशहूर है.

Reference-http://jharkhand.nic.in/
वैद्यनाथधाम -

द्वादश ज्योतिर्लिंग [भाग-2]-सोमनाथ & केदारनाथ

महाशिवरात्रि पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ..


जैसा की पिछली पोस्ट में बताया गया था कि भारत देश में बारह ज्योतिर्लिंग हैं.
इनके नाम इस प्रकार हैं-
(1) सोमनाथ, (2) मल्लिकार्जुन, (3) महाकालेश्वर, (4) ओंकारेश्वर (5) वैद्यनाथ, (6) भीमशंकर, (7) रामेश्वर,
(8) नागेश्वर, (9) विश्वनाथजी, (10) त्र्यम्बकेश्वर, (11) केदारनाथ, (12) घृष्णेश्वर[घुश्मेश्वर].
***इनमें से 3 महाराष्ट्र राज्य में[त्रयम्बकेश्वर,भीमशंकर,घुश्मेश्वर,] ही हैं,
गुजरात में 2[सोमनाथ,नागेश्वर] , तमिलनाडु के 1-रामेश्वरम में मौजूद [रामलिंगेश्वर],उत्तर में एक[केदारनाथ ],उत्तर प्रदेश में एक[विश्वनाथ],आंध्रा प्रदेश में एक[श्रीशैलम-मल्लिकार्जुन महादेव] ,झारखंड के देवघर नामक स्थान में 1[वैद्यनाथ]और मध्य प्रदेश में दो ज्योतिर्लिंग[महाकालेश्वर &ओंकारेश्वर] हैं.

आईए सब से पहले 'सोमनाथ 'के दर्शन के लिए चलते हैं-

द्वादश ज्योतिर्लिंग [भाग-१]

महाशिवरात्रि पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ..
भारत देश की यही खूबी है कि यहाँ सभी पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं.
भोले भंडारी भगवान शिव की परम भक्त हूँ इसलिए इच्छा हुई कि भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लींगों की पावन यात्रा
आज से आरंभ की जाए .
इस यात्रा को शुरू करने से पहले जान लें कि आख़िर भगवान शिव की आराधना करते क्यों हैं?शिवलिंग क्या है?

शिव भारतीय धर्म, संस्कृति, दर्शन ज्ञान को संजीवनी प्रदान करने वाले हैं. इसी कारण अनादि काल से भारतीय धर्म साधना में निराकार रूप में शिवलिंग की व साकार रूप में शिवमूर्ति की पूजा होती है. शिवलिंग को सृष्टि की सर्वव्यापकता का प्रतीक माना जाता है. भारत में भगवान शिव के अनेक ज्योतिलिंग सोमनाथ, विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, वैधनाथस नागेश्वर, रामेश्वर हैं.ये देश के विभिन्न हिस्सों उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में स्थित हैं, जो महादेव की व्यापकता को प्रकट करते हैं शिव को उदार ह्रदय अर्थात् भोले भंडारी कहा जाता है।
कहते हैं ये थोङी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न हो जाते हैं। अतः इनके भक्तों की संख्या भारत ही नहीं विदेशों तक फैली है। भगवान शिव का महामृत्जुंजय मंत्र पृथ्वी के प्रत्येक प्राणी को दीर्घायु, समृद्धि, शांति, सुख प्रदान करता रहा है और चिरकाल तक करता रहेगा.

दंतवाडा-‘छत्तीसगढ़'

chhattisgarh 'छत्तीसगढ़' ---यही वह राज्य है जहाँ से मैं समझती हूँ आज की तारीख में सब से अधिक हिंदी ब्लॉगर हैं. इस राज्य के बारे में जो कुछ भी यहाँ लिख रही हूँ उसमें अगर कहीं कोई त्रुटी दिखाई दे तो कृपया मुझे सूचित करीए.
छत्तीसगढ़ -जैसा की नाम ही इशारा करता है यह क्षेत्र ३६ गढ़ों का समूह रहा होगा इस लिए इस का नाम छत्तीसगढ़ पड़ा.

पौराणिक इतिहास-
कहते हैं कि राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या के नाम पर इस क्षेत्र को कोसल कहा जाने लगा था.
माना यह भी जाता है कि भगवान् राम अपने वनवास के समय 'छत्तीसगढ़ ' से हो कर गुजरे थे और शबरी ने उन्हें बेर यहीं खिलाये थे.
महाभारत से भी जोड़ती कहानियां कुछ इतिहासकार बताते हैं..उनके अनुसार इतिहासकार बिलासपुर के पांडो, कोरवा और कंवर जनजातियों का सम्बन्ध पांडव और कौरवों से हो सकता है.
रायगढ़ के 'कबरा पहाड़' और सिंघनपुर की गुफ़ाओं में मिले भित्तिचित्र इस क्षेत्र में मानव जाती के विकास की कहानी सुनाते हैं.
यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्नावशेष यह बताते कि यहाँ पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध के साथ ही अनेकों आर्य तथा अनार्य संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा होगा.
- इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं. यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी.
-कहते हैं-महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ में हुआ था.
इतिहास से --
-1000 ई. में पहला कलचुरि राजा कलिंगराज कोसल पहुँचा ,उसके बेटे रत्नदेव ने अपने राज्य की राजधानी रत्नपुर में बनाई.कलचुरि शासन दो हिस्सों में बँटा था. एक शिवनाथ के उत्तर में और दूसरा शिवनाथ के दक्षिण में.. दोनों ओर 18 गढ़. जहाँ ये १८-18 प्रशासनिक इकाईयां बनीं.इस तरह कलचुरियों के 36 गढ़ थे जो 36garh के नामकरण का आधार बना.
- मुगलों और मराठों के शासन काल में बस्तर को 36garh शामिल हुआ.
-मराठे और कुछ समय तक अंग्रेज भी छत्तीसगढ़ का शासन नागपुर से सँभालते थे.बाद में अंग्रेजों में रायपुर को राजधानी बना दिया.
-अंग्रेजी हुकूमत के समय 1860 में मध्य प्रांत का गठन हुआ. नागपुर, महाकोसल और छत्तीसगढ़ को मिलाकर वे इसे 'सीपी एंड बरार 'कहते थे. इसमें छोटी-छोटी कुल 14 रियासतें थीं.
-१९४७ में आज़ादी के बाद १९५६ तक छत्तीसगढ़ महाकोसल का हिस्सा था.
-1956 में छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा बना.
-छत्तीसगढ़ को अपनी पहचान बनाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी.खूबचंद बघेल [१९५६-६९ ] पवन दीवान, शंकर गुहा नियोगी ने [1977 से 1990 ]आन्दोलन चलाये.
-1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में छत्तीसगढ़ राज्य की मांग की गई और कुछ पार्टियों के लिए यह चुनावी मुद्दा बन गया.
और इस तरह लम्बे इंतज़ार के बाद पहली नवंबर 2000 से देश के नक्शे पर मध्य प्रदेश से कट कर 'छत्तीसगढ़ 'नाम का एक नया राज्य बन गया.
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जानते हैं इस राज्य के बारे में--
छत्तीसगढ़ के उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार. राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं - महानदी, शिवनाथ , खारुन पैरी और इन्द्रावती नदी.
मूल भाषा-छत्तीसगढ़ी ,
राजधानी-रायपुर
जिले-१६
यहाँ का लोक गीत-संगीत तो बहुत प्रसिद्द हैं.
कई जनजातियों वाला यह राज्य धान की भरपूर पैदावार के कारण धान का कटोरा भी कहलाता है.
भारत देश की १२% वनसंपदा यहीं है.राज्य का ४४% हिस्सा वनों से घिरा है.यहाँ २ राष्ट्रिय उद्यान,११ Wildlife Sanctuaries पर्यटकों का मुख्य आकर्षण हैं.
मेरी जानकारी में विद्युत उत्पादन और आपूर्ति में यह राज्य स्वयम में सक्षम है.
यह राज्य सभी राज्यों से सड़क,वायु,और रेल मार्ग से जुडा हुआ है.
छत्तीसगढ़ में बहुत कुछ है देखने के लिए.पुरानी गुफाएं,मंदिर,जल प्रपात आदि..हर जिले में कुछ न कुछ !

आज मैं आप को छत्तीसगढ़ में दक्षिण बस्तर क्षेत्र के एक जिले दंतवाडा ले कर चलती हूँ.यहाँ साल और टीक के जंगल तो है ही साथ ही पर्वत श्रृंखला भी प्रकृति की भेंट है. मुख्यत इन्द्रावती ,शाभारी,और गोदावरी नदियाँ इस क्षेत्र से बहती हैं.बरसूर ,दंतवाडा और भद्रकाली इतिहासिक महत्व के स्थान हैं.लोहे की खाने,पहाड़ी चोटियों के दृश्य,पार्क आदि भी देखने की जगहें हैं.कुछ दर्शनीय स्थल इस प्रकार हैं-
सूर्या मूर्ती बरसूर,विष्णु मूर्ती ,बड़ा गणेश ,गुरु बेताल ,मामा भांजा मंदिर ,शिव मंदिर बचेली,बत्तीसा मंदिर,इन्द्रावती नदी,बोद्धघाट सात धार,आदि.

akash-nagar kailash nagar

कैलाश नगर , आकाश नगर पहाड़ी पर बसे लोकप्रिय स्पॉट हैं.

'दंतवाडा में विश्व में सबसे अधीक iron -ore के desposits पाए गए हैं.
यहाँ की मिटटी में खनिज प्रचुर मात्रामें है .

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यहाँ का मुख्य आकर्षण है माता दंतेश्वरी देवी का मंदिर-:
आज जानते हैं 'बस्तर 'की कुल देवी के दंतेश्वरी देवी के मंदिर के बारे में-:
सम्बंधित पौराणिक कथा-
कहा जाता है कि सती पार्वती ने अपने पिता द्वारा अपने पति, भगवान शिव का अपमान किए जाने पर हवन कुंड में कूदकर अपनी जान दे दी थी. भगवान शिव को आने में थोड़ी देर हो गई, तब तक उनकी अर्धांगिनी का शरीर जल चुका था. उन्होंने सती का शरीर आग से निकाला और तांडव नृत्य आरंभ कर दिया. अन्य देवतागण उनका नृत्य रोकना चाहते थे, अत: उन्होंने भगवान विष्णु से शिव को मनाने का आग्रह किया. भगवान विष्णु ने सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए और भगवान शिव ने नृत्य रोक दिया.
कहा जाता है कि डंकिनी-शंखनी नदी के तट पर परम दयालु माता सती का दांत वहां गिरा था और यह जगह एक शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया और दंतेश्वरी माता के रूप में देवी को यहाँ पूजा जाने लगा.

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इसी मंदिर से सम्बंधित बस्तर के राजा की एक कहानी और सुनिए--
बस्‍तर के राजा अन्‍नमदेव वारांगल, आंध्रप्रदेश से अपनी विजय के बाद बस्‍तर की ओर बढ रहे थे साथ में मॉं दंतेश्‍वरी का आशिर्वाद था . गढों पर कब्‍जा करते हुए बढते अन्‍नमदेव को माता दंतेश्‍वरी नें वरदान दिया था जब तक तुम पीछे मुड कर नहीं देखोगे, मैं तुम्‍हारे साथ रहूंगी . राजा अन्‍नमदेव बढते रहे, माता के पैरों की नूपूर की ध्‍वनि पीछे से आती रही, राजा का उत्‍साह बढता रहा .
शंखिनी-डंकिनी नदी के तट पर विजय मार्ग पर बढते राजा अन्‍नमदेव के कानों में नूपूर की ध्‍वनि आनी अचानक बंद हो गई . वारांगल से पूरे बस्‍तर में अपना राज्‍य स्‍थापित करने के समय तक महाप्रतापी राजा के कानों में गूंजती नूपूर ध्‍वनि के अचानक बंद हो जाने से राजा को वरदान की बात याद नही रही, राजा अन्‍नमदेव कौतूहलवश पीछे मुड कर देखा.
माता का पांव शंखिनी-डंकिनी के रेतों में किंचित फंस गया था! अन्‍नमदेव को माता नें साक्षात दर्शन दिये पर वह स्‍वप्‍न सा ही था . माता ने उनसे कहा 'अन्‍नमदेव तुमने पीछे मुड कर देखा है, अब मैं जाती हूं . बस वहीँ 'डंकिनी-शंखनी' के तट पर माता सती के दंतपाल के गिरने वाले उक्‍त स्‍थान पर ही जागृत शक्तिपीठ, बस्‍तर के राजा अन्‍नमदेव ने अपनी अधिष्‍ठात्री मॉं दंतेश्‍वरी का मंदिर बनवाया दिया .
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----ऐसा भी कहा जाता है कि यह नाम देवी का नया नाम है इनका पुराना नाम मानिकेश्वरी देवी था.

danteshwari-temple chhatarpur mandir

-यह मंदिर चार भागों में है-
गर्भ गृह,महा मंडप,मुख्य मंडप, और सभा मंडप..-पहले दो भाग पत्थर में बने हैं.
यह मंदिर भी कई बार बनवाया गया है और वर्तमान स्वरुप ८०० साल पुराना है.एक गरुड़ स्तम्भ भी मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने बाद में ही बनवाया गया था.
यहाँ का ५०० साल से चलता आ रहा बस्तर दशेहरा मेला बहुत ही प्रसिद्द है.एक लकडी के रथ पर माता की कैनोपी को रख कर यहाँ की tribes के लोग खींचते हैं.

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कैसे पहुंचे-
यह जगह जगदलपुर से डेढ़ घंटे कि दूरी पर है.
सबसे नज़दीक हवाई अड्डा -रायपुर का है.
विशाखापत्तनम से बैलाडाला जाती हुई रेल थोडी देर को इस स्टेशन पर रूकती है.
जगदलपुर सब से करीबी शहर है.
आंध्र प्रदेश से दंतवाडा के लिए नियमित बस सेवा है.
मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ के बड़े शहरों को जाती बसें भी यहाँ रुक कर जाती हैं.
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कब जाएँ--वर्ष पर्यंत जब भी माता का बुलावा हो.
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आज के लिए इतना ही....अगली बार एक नयी जगह ले कर आप को चलेंगे,तब तक के लिए नमस्कार.

http://chhattisgarh.nic.in/

मणिपुर और श्री श्री गोविंदाजी मंदिर

'जन्‍माष्‍टमी की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं'
मणिपुर
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आईये चलें एक नए राज्य की सैर पर..यह राज्य है मणिपुर.
Manipurयह राज्य भारत के पूर्वी सिरे पर स्थित है.इसके पूर्व में म्‍यांमार (बर्मा) और उत्तर में नागालैंड राज्‍य हैं , इसके पश्चिम में असम राज्‍य और दक्षिण में मिजोरम राज्‍य और म्‍यामांर हैं.कुल क्षेत्रफल 22,327 वर्ग किलो मीटर है.
इस राज्य में जिले हैं.
राजधानी इम्फाल’ है.भाषा मणिपुरी बोली जाती है. manipur-travel-map
मणिपुर में भौतिक रूप से दो भाग हैं, १-पहाडियां और २-घाटी
पहाडियों से घिरी मध्य भाग में घाटी है.पहाडियां राज्‍य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 9/10 भाग घेरती हैं!यह पर्वतीय श्रृंखला उत्तर में ऊंची है और धीरे धीरे मणिपुर के दक्षिणी हिस्‍से में पहुंचने पर इसकी ऊंचाई कम हो जाती है.
अधिकारिक site के अनुसार जनसंख्‍या 2,293,८९६ है.
राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था का मुख्‍य आधार कृषि और संबद्ध गतिविधियां ही हैं लेकिन बढ़ती आबादी के कारण कृषि की हालत भी कमजोर है.
राज्‍य में कृषि के बाद रोजगार की सबसे अधिक संख्‍या प्रदान करने वाला सबसे बड़ा कुटीर उद्योग हथकरघा उद्योग है.मणिपुरकी साडिया,शोलें बहुत प्रसिद्द हैं.हरथकरघा बुनाई का पारंपरिक कौशल यहां की महिलाओं के लिए न केवल आय का स्त्रोत और प्रतिष्‍ठा का प्रतीक है बल्कि यह उनके सामाजिक – आर्थिक जीवन का एक अविभाज्‍य अंग है.सीमा व्‍यापार को बढ़ावा देने के लिए सीमावर्ती शहर मोरेह में वेयरहाउस, सम्‍मेलन कक्ष और ठहरने की सुविधा के लिए एक केंद्र भी राज्य सरकार ने स्‍थापित किया गया है.
प्राकृतिक संपदा से भरपूर-- Lilium mackliniae
राज्य में घने और खुले वन है, जो राज्‍य के भौगोलिक क्षेत्र का 77.12 प्रतिशत है!
मणिपुर के उखरूल जिले के शिराय गांव के वनो में स्‍वर्गपुष्‍प कहे जाने वाले शिराय लिली (लिलियम मैक्‍लीनी) फूल मिलते है, जो विश्‍व में किसी भी अन्‍य स्‍थान में नहीं होते.imphal valley
इसी प्रकार जूको घाटी में दुलर्भ प्रजाति‍ के जूको लिली (लिलियम चित्रांगद) पाए जाते है। ज्ञात रहे कि मणिपुर अपनी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है. यहां कई तरह के दुर्लभ पेड़ पौधे और जीव-जंतु भी पाए जाते है.
Loktak Lake
Sangai यह ‘संगाई’ हिरण (सेरवस इल्‍डी इल्‍डी) का भी निवास स्‍थान है, जो विश्‍व की दुर्लभ नस्‍लो में एक है. यह केबुल लामजाओ के प्राकृतिक अधिवास क्षेत्र में पाया जाता है.
1977 में इस अधिवास कोराष्‍ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया है-- इसकी अनोखी विशेषता तैरता हुआ पार्क है जिसमें ’फुमडी’ नाम की वनस्‍पति उगती है. संगाई हिरण इसी वनस्‍पति पर निर्भर है.
इसके अलावा भांगोपोकपी लोकचाओ वन्‍यप्राणी अभयारण्‍य को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है.
और हाँ ..यहाँ के वनों में टेक्‍सस बकाटा, जिनसेंग जैसे दुर्लभ औषधीय पौधे भी पाए जाते है.
जानते हैं इस राज्य के इतिहास के बारे में--
ऐसा माना गया है कि ईसा से पूर्व भी यहाँ का इतिहास बहुत शानदार रहा है.राजवंशों का लिखित इतिहास सन् ३३ [तैतीस]से मिलता है.यह इतिहास पखंगबा के राज्‍यभिषेक के साथ शुरू होता है और उसके बाद कई राजाओं ने यहाँ राज्य किया.मणिपुर की स्‍वतंत्रता और संप्रभुता 19वीं सर्दी के शुरू तक बनी रही.मगर उस के बाद (1819 से 1825 तक) बर्मी लोगो ने यहां पर कब्‍जा करके शासन किया.ब्रिटिश शासन ने १८९१ में इस पर कब्जा किया.1947 में बाकि देश के साथ स्‍वतंत्र हुआ. 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने पर यह एक मुख्‍य आयुक्‍त के अधीन भारतीय संघ में भाग ‘सी’ के राज्‍य के रूप में शामिल हुआ था.
21 जनवरी, 1972 को मणिपुर को पूर्ण राज्‍य का दर्जा मिला और उस समय 60 निर्वाचित सदस्‍यों वाली विधानसभा गठित की गईं.
यहाँ मनाये जाने वाले त्यौहार--
कहते हैं मणिपुर में पूरे साल ही कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है..
प्रमुख त्‍योहार हैं-- लाई हारोबा, रास लीला, चिरओबा, निंगोल चाक-कुबा, रथ यात्रा, ईद-उल-फितर, इमोइनु, गान-नागी, लुई-नगाई-नी, ईद-उल-जुहा, योशांग(होली) दुर्गा पूजा, मेरा होचोंगबा, दिवाली, कुट तथा क्रिसमस आदि
मणिपुर कैसे जाएँ?--
१-सड़कें: 3 राष्‍ट्रीय राजमार्ग - i) रा. रा. - 39, ii) रा. रा - 53 और iii) रा. रा १५० हैं.
सभी पडोसी राज्यों से सड़क मार्ग से आवागमन की सुविधा है.
२-उड्डयन: इम्‍फाल हवाई अड्डा पूर्वोत्तर क्षेत्र में राज्‍य का दूसरा सबसे बड़ा हवाई अड्डा है, जो क्षेत्र के क्षेत्र को आइजोल, गुवाहाटी, कोलकाता, सिल्‍चर और नई दिल्‍ली को जोड़ता है.
३-रेलवे: मई 1990 में जिरिबाम तक रेल लाइन पहुंचाने के साथ ही यह राज्‍य भी देश के रेल-मानचित्र में शामिल हो गया है. यह इंफाल से 225 कि.मी. दूर है. इंफाल से 215 कि.मी. की दूरी पर स्थित दीमापुर निकटतम रेलवे स्‍टेशन है.
क्या देखें??-
मुख्‍य पर्यटन केंद्र हैं-—
कांगला, श्री श्री गोविंदाजी मंदिर,ख्‍वाराम्‍बंद बाजार (इमाकिथेल), युद्ध स्‍मारक, श‍हीद मीनार, नूपी लेन (स्त्रियो का युद्ध) स्‍मारक परिसर, खोगंमपट्ट उद्यान, विष्‍णु मंदिर, सेंदरा, मारह, सिरोय गांव सिरोय पहाडिया, ड्यूको घाटी, राज्‍य संग्रहालय, केनिया पर्यटक आवास, खोग्‍जोम युद्ध स्‍मारक परिसर आदि.
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Mukhy Akarshan-
''सम्बन्लेई सेकपिल''[sambanlei ]
sekpilon
इम्फाल में ही तीन किलोमीटर दूर गिनिस बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज दुनिया का सब से लंबा पौधा ..Duranta repens Linn.-नीलकंठ के फूल का है.जो आम तौर पर २० फीट से ऊँचा नहीं बढ़ता.
' ''सम्बन ली सेकपिल 'नाम का यह अनोखा पौधा आसमान को जाने वाली सीढ़ी के नाम से भी मशहूर है.इस समय इस की ऊँचाई ६१ फीट है और इसमें ४४ पायदान बनायी गयी हैं.
Shri Moiranthem Okendra Kumbi ने इसे उगाया है और वही इस को इस तरह से बढा कर रहे हैं.विस्तार से पढने के लिए यहाँ क्लिक करें-http://imphalwest.nic.in/sambanlei.html
['Samban-Lei Sekpil' the tallest Topiary in the World]
पश्चिमी इम्फाल में आप श्री श्री गोविन्द जी का मंदिर देखने जाएँ तो इसे भी देखना न भूलें.
अब मैं आप को इम्फाल के श्री श्री गोविन्दजी के मंदिर के बारे में बताती हूँ--
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यह कान्गला किले के परिसर में ही बना हुआ है.
यह मंदिर १८ ४६ में महाराजा नारा सिंह [१८४४-१८४६ ]के शासन काल में बनवाया गया था.इस मंदिर का खासा ऐतिहासिक महत्व बताया जाता है.यह मणिपुर के पूर्व शासकों के महल कान्ग्ला के पास ही बनवाया गया था.
१८६८ में आये भूकम्प में इस मन्दिर को बहुत नुकसान हुआ था.राधा-गोविन्द जी कि मूर्ति को भी नुकसान पहुंचा महाराजा चन्द्र्कीर्ति[१८५९-८६] ने इस मन्दिर को दोबारा बनवाया.यह मन्दिर राधा-कृष्ण को समर्पित है.
इस मंदिर के ऊपर दो खूबसूरत सुनहरे गुम्बद हैं.और बाहर लगी है एक बहुत बड़ी घंटी.
Govindji temple a viewgovind ji temple bell tower govindjee temple ki bell
मंदिर में मुख्य रूप से विष्णु जी की मूर्ति है जिस के एक तरफ राधा -गोविन्द ,बलराम ,और कृष्ण की मूर्ति हैं उनके दूसरी तरह जनन्नाथ ,बालभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ लगी हुई हैं.
मदिर के दखिन-पश्चिम की तरफ ’ रासमंडल ’एक पवित्र जगह है,यहां रासलीला प्रस्तुत की जाती है.
manipur dance2 raasleela
त्योहारों के समय इस मंदिर की रौनक देखते ही बनती है.
होली[दोलिजात्रा ] के समय यहाँ पांच दिन ख़ास आयोजन होते हैं.वह समय यहाँ आने के लिए सर्वश्रेष्ठ है.उन दिनों सारी रात लड़के लड़कियां यहाँ का लोक नृत्य' थाबल चंग्बा 'करते हैं.
mandir mein होली के पर्व की कुछ तस्वीरें--
Manipur danceholi fest2
manipur-thabal chongbagovind ji temple -holi-fest
govindjee temple -holi celebrations-manipurgovindji temple mein pichkari day
References-
http://imphalwest.nic.in/
http://cicmanipur.nic.in
***ShriKhrishn Janmashtami ki Hardik Shubhkamnaye***
--Alpana