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द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-6]-महाकालेश्वर

‘ ऊँ महाकाल महाकाय , महाकाल जगत्पते। महाकाल महायोगिन् ‌ महाकाल नमोऽस्तुते॥ - महाकाल स्त्रोत(महाकाय, जगत्पति, महायोगी महाकाल को नमन) ...

छत्तीसगढ़ का खजुराहो

भारत के राज्य छत्तीसगढ़ के  बारे में हम आप को अपनी पुरानी पोस्ट में बता चुके हैं.
इसी राज्य के एक जिले कबीरधाम [पुराना नाम कवर्धा ]में आज आप को लिए चलते हैं जो रायपुर से करीब 100 किमी दूर है.
यह स्थान राज्य के मुख्यमंत्री डॉ.  रमण सिंह जी का गृह जिला भी है.पिछड़ा समझे जाने वाले इस राज्य ने कम समय में अपनी मजबूत अंतर्राष्ट्रीय छवि बनाई है.यहाँ पर्यटक भारी संख्या में घूमने आते हैं.

indian pav 2008 २००८ में दुबई में लगे ग्लोबल विल्लेज में भारत के पण्डाल की थीम 'कवर्धा महल' पर आधारित थी.उस के द्वारा मुझे ही नहीं वरन और भी बहुत से लोगों का छत्तीसगढ़ के इस महल से पहली बार परिचय हुआ था.
कवर्धा शहर सकरी नदी के तट पर बसा हुआ है,जहाँ नागवंशी और हेयवंशी शासकों ने राज्य किया था और अनेक मन्दिर और किले बनवाए थे. यहाँ आने वाले पर्यटक सतपुड़ा की पहाड़ियों की मैकाल पर्वत श्रृंखला पर ट्रेक्किंग आदि का आनंद ले सकते हैं.
Dr.Raman अपने कार्यकाल में ही मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने  लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित लगभग पन्द्रह किलोमीटर लम्बी छपरी, रामचुंआ, सरोदा डामरीकृत सडक का लोकार्पण करते हुए भोरम देव के ऐतिहासिक मंदिर को राज्य की एक मूल्यवान सांस्कृतिक धरोहर बताया था.राज्य सरकार द्वारा किये जा रहे पर्यटन हेतु विकास कार्य भी यहाँ देखे जा सकते हैं.
हर साल मार्च के महीने में भोरमदेव महोत्सव का आयोजन बहुत  ही धूमधाम से किया जाता है.इसीलिये इस स्थान पर जाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय वही है,जिस से आप स्थानीय  लोक कला और संस्कृति को भी करीब से जान  सकें.
Bhoramdeo temple Main Gate
अब बताते हैं आप को कबीरधाम जिले के  छपरी नामक गांव के पास , धरातल से 30 मीटर उंचाई पर स्थित  इस मंदिर के बारे में ,जिसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहते हैं.   सतपुड़ा पहाड़ियों के बीच हरे भरे  जंगलों में  तालाब के किनारे बने इस मंदिर स्थापत्य शैली चंदेल शैली की है और निर्माण योजना की विषय वस्तु खजुराहो और सूर्य मंदिर के समान है  इसीलिये भी  इसे  छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहते हैं  .

Bhoramdev temple Bhoramdev temple wall
निर्माणकाल सन 1065 से 1090 के मध्य माना  जाता है.इसका निर्माण कलचुरि राजा पृथ्वीदेव प्रथम के समकालीन चवरापुर के फणिवंशीय छठे राजा गोपालदेव   ने कराया था. बड़ादेव, बूढ़ादेव या भोरमदेव के नाम से गोंड जाती के लोगों में भगवान शिव की  पहचान है.
भगवान शिव की आराधना भोरमदेव के रूप में इस मंदिर में हज़ार सालों से आज भी  जा रही है. भारत के प्राचीनतम कुछ मंदिरों में यह मंदिर भी है जहाँ अनवरत उसी प्राचीन स्थान पर पूजा अर्चना होती आ रही है.इस कारण भी इसकी विशेष महत्ता है.
काले पत्थर में निर्मित मंदिर के तीन प्रवेश द्वार हैं. इस के 2.80X 2.80 मीटर फीट माप वाले वर्गाकार गर्भ गृह में काले पत्थर का शिवलिंग  है जिसके के  ऊपर  सहस्त्र दल कमल जैसा बना हुआ है.
श्री अनिल पुसदकर जी ने इसी मंदिर पर लिखे अपने एक  लेख में बताया है कि  दुर्लभ शिल्पकला और नागर शैली कलाकृतियों का ये अनूठा और सुन्दर उदाहारण है। पूर्वाभिमुख मंदिर के तीन प्रवेश द्वार है। तीनों द्वार पर तीन अर्ध्द मण्डप और बीच में वर्गाकार मण्डप अंत में गर्भगृह निर्मित है। द्वार के दोनों ओर शिव की त्रिभंग मूर्तियां सुशोभित है। ललाट बिंब पर तप मुद्रा में द्विभुजीय नागराज जिसके शिरोभाग में पंच फन है, आसीन है। प्रवेश द्वार शाखा लता बेलों से अंलंकृत है। बीच का वर्गाकार मण्डप 16 खंभों पर टिका है। स्तंभों की चौकी उल्टे विकसित कमल के समान है। जिस पर बने कीचक याने भारवाहक छत के भार को थामे हुए है। मण्डप की छत पर सहस्त्र दल कमल देखने लायक है।
इस मंदिर के शिखर  पर कोई कलश नहीं दिखता कहते हैं कि यहाँ के कलश को १६ वीं शताब्दी  में हुए आक्रमण में विजय प्रतीक के रूप में रतनपुर के शासक अपने साथ ले गए थे.
मंदिर के परिसर    में अन्य देवी देवताओं की पूजा स्थल भी बने हुए हैं.मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीन समानांतर क्रम में विभिन्न प्रतिमाओं के दर्शन होते हैं .नागवंशी शासकों के समय यहां सभी धर्मो को समान महत्व प्राप्त था इस का उदहारण  है कि दीवारों पर शिव की विविध लीलाओं,विष्णु के अवतारों ,अन्य कई  देवी देवताओं की विभिन्न प्रतिमाएं, गोवर्धन पर्वत उठाए श्रीकृष्ण के अलावा   जैन तीर्थकरों का भी अंकन है.
काम कलाओं को प्रदर्शित करते नायक-नायिकाओं के अलावा ,पशुओं विशेष  रूप से हाथी और सिंह की प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं.
अपने भव्य और स्वर्णिम काल को दर्शाता यह मंदिर एवं यह स्थल बेहद रमणीक है.
Bhoramdeo Lake and Laxman Jhula bhoramdeo park
इस मंदिर के प्राकृतिक सौंदर्य की पृष्ठभूमि एवं इसके मंदिरवास्तु को ध्यान में रखकर सर अलेक्टजेण्डर कनिंघम ने उनके द्वारा देखे गये सर्वाधिक सुसज्जित मंदिरों में से एक माना था.
  भोरमदेव मंदिर से थोड़ी   दूरी पर चौरा ग्राम के निकट  शिव मंदिर 'मडवा महल या दूल्हादेव मंदिर' और एक अन्य शिव मंदिर  'छेरकी महल' भी दर्शनीय हैं.
रायपुर तक आप पहुंचे  ही हैं तब सड़क मार्ग से बस,टेक्सी या निजी वहां से यहाँ पहुँच सकते हैं.नजदीकी रेलवे और हवाई अड्डा रायपुर ही है.

Video of this temple -:

17 comments:

राम त्यागी said...

आपने हमें इतनी सुन्दर जगह घुमाया , इसके लिए शुक्रिया !! नाम तो पहले भी सुना था पर आपने सब जानकारी एक जगह देकर दिल खुस कर दिया

Suman said...

nice

अजय कुमार said...

पहली बार सुना ,अच्छा लेख

Alpana Verma said...

अजय कुमार ने आपकी पोस्ट " छत्तीसगढ़ का खजुराहो " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

पहली बार सुना ,
अच्छा लेख

नीरज जाट जी said...

इसके बारे में तो मुझे भी पहली बार पता चला।

अनुनाद सिंह said...

देश में इतने सुन्दर और ऐतिहासिक महत्व के स्थान हैं किन्तु हमे जानकारी नहीं है। जानकारी देने के लिये साधुवाद।

मैने इस लेख की लिंक हिन्दी विकिपिडिया के 'कबीरधाम जिला' नामक लेख पर डाल दी है।

आशीष मिश्रा said...

छत्तीसगढ़ के खजुराहो के बारे मे जानकर काफी अच्छा लगा. आपका यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है.

डॉ महेश सिन्हा said...

कहाँ बैठे बैठे आप इतनी खोज कर लेती हैं आश्चर्यजनक !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इतनी सुन्दर जानकार के लिए आभार

शरद कोकास said...

हम तो यह स्थल देख आये हैं लेकिन इतनी अच्छी प्रस्तुति के लिये आपको धन्यवद देना चाहते हैं । शरद कोकास - दुर्ग

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

संपूर्ण जानकारी, धन्‍यवाद.

दीर्घतमा said...

नमस्ते जी
आपकी पोस्ट बहुत कुछ कहती है भारत तो संस्कृतियों क़े खजानों क़ा देश है संस्कृतियों को संजोये रखना हमारा कर्तब्य है अपने जो यह भारतीय धरोहरों की जानकारी देना शुरू किया है वास्तव में आप देश क़ा एक बहुत बड़ा कार्य कर रहे है.
इस ऐतिहासिक छत्तीसगढ़ क़े खजुराहो की जानकारी देने क़े लिए धन्यवाद.

Anil Pusadkar said...

aabhar aapka chhattisgarh par aapki is post ke liye.

Rahul Singh said...

यह मंदिर मिथुन मूर्तियों और प्रसिि‍‍द्ध के कारण छत्‍तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाता है. शैलीगत दृष्टि से यह मालवा की भूमिज शैली का छत्‍तीसगढ़ी प्रतिनिधि है, जिसका छत्‍तीसगढ़ में दूसरा दुर्लभ नमूना आरंग का भाण्‍ड देवल है. भोरमदेव-कवर्धा अंचल वल्‍लभाचार्य जी से संबंधित माने जाने वाले हरमू या हरमो और इन दिनों बोड़ला के पास सिली पचराही में किए जा रहे उत्‍खनन के कारण चर्चा में है.

P.N. Subramanian said...

बड़ी वृहद् एवं सुन्दर जानकारी दी है आपने. भोरमदेव के चारों तरफ की प्राकृतिक छठा देखते ही बनती है.

Vijai Mathur said...

Alpanaji,
Ghar baithey-2 aapkey aalekh key madhyam se chatisgarh ghoom liye .
bahaut-2 Dhanyawad.

vijay pratap said...

bahut hi bhariya jankari h ye to hum yaha aye to jarur dekhenge ise thanks a lot