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द्वादश ज्योतिर्लिंग -[भाग-6]-महाकालेश्वर

‘ ऊँ महाकाल महाकाय , महाकाल जगत्पते। महाकाल महायोगिन् ‌ महाकाल नमोऽस्तुते॥ - महाकाल स्त्रोत(महाकाय, जगत्पति, महायोगी महाकाल को नमन) ...

हिन्दू-मुस्लिम एकता की प्रतीक: एक दरगाह


सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की देवाशरीफ स्थित दरगाह
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उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है 'बाराबंकी'.यह लखनऊ से २९ किलमीटर पूरब में स्थित है 

बाराबंकी को नवाबगंज के नाम से भी जाना जाता है.यह जगह ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण है।
इस जगह पर कई राजाओं ने लम्बे समय तक शासन किया
देवाशरीफ स्थित दरगाह लखनऊ से 42 किलोमीटर और बाराबंकी के जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर की दूरीपर स्थित है

सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की जन्मस्थली देवा है.उनका जन्म वर्ष 1823 इसवी में हुआ था


'जो रब वही राम 'का संदेश देने वाले सूफी संत हाजी शाह ने विश्व के सभी लोगों को प्रेम से रहने का संदेश दिया था

 उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके हिन्दू और मुस्लिमों शिष्यों ने मिलकर उनकी याद में यह स्थान बनवाया था
हर साल यहाँ जुलाई के महीने में उर्स और कार्तिक माह में .सैयद कुर्बाद अली शाह के उर्स पर काफी बड़े मेले काबाराबंकी- फतेहपुर मार्ग पर आयोजन किया जाता है,जिसे देवा मेला के नाम से जाना जाता है.


कहते है कि मुस्लिमो के तीन मुख्य तीर्थ स्थान ख्वाजा साहब अजमेर और निजामुद्दीन औलिया दिल्ली की यात्रादेवा के हाजी वारिस अली शाह पर माथा टेकने के बाद ही पूरी मानी जाती  है। 

यहाँ अन्य धर्मो के लोग भी उसी संख्या में माथा टेकते हैं जितने की मुस्लिम समुदाय के लोग।
हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी इस दरगाह को माना जाता है.

 सूफी संत हाजी शाह

वेबदुनिया साईट पर श्री ए.के.वारसी जी ने इस विषय में  लिखा है उसका एक अंश  -

भारत की इस पावन भूमि पर जन्म लेकर सूफी संतों और महापुरुषों ने इसे मानवता और प्रेम का संदेश प्रदान करने के लिए अपना केंद्र बनाया, जो विश्व में एक बेमिसाल बात है। इसी कड़ी के तहत हुजूर वारिस अली शाह ने भी आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व रमजान के महीने की पहली तारीख को इस पावन भूमि पर जन्म लिया।
उनका समाधि स्थल (दरगाह) उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिले के नगर देवा शरीफ में आज भी प्रेम व एकता का संदेश देने के साथ-साथ मानवीय परेशानियों से मुक्ति का केंद्र बना हुआ है। वहाँ से आज भी हजारों श्रद्धालु उपस्थित होकर लाभान्वित हो रहे हैं। वारिस अली हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत हुसैन आली मुकाम इब्ने अली व फातमा की 26वीं पीढ़ी में हैं।

हुजूर वारिसे पाक ने समस्त मानव जाति को एक ही औलादे आदम सिद्ध कर प्रेम और एकता के सूत्र में बाँधा। उन्होंने सभी को नाम परिवर्तन व धर्म परिवर्तन किए बिना ही अपने संदेशों का पालन करने के लिए प्रेरित किया। उनके सभी अनुयायी अपने नाम के साथ 'वारसी' उपनामजोड़ते हैं। 
 जैसे राजा पंचमसिंहजी वारसी, टामिशाह साहब वारसी, रोमशाह वारसी, पंडित दीनदारशाह वारसी, लाला कन्हैयालालजी वारसी, पंडित खुशहालदास वारसी, बेदमशाह वारसी आदि।
ये सभी नाम इस बात का प्रमाण हैं कि ईश्वर के यहाँ कोई भेदभाव नहीं है। सभी का धर्म इंसानियत है और जाति मानव है, चाहे वे किसी भी संप्रदाय से क्यों न हों। उन्होंने निःस्वार्थ सेवा की दृष्टि से पूरे जीवन में संसार के हर मोह को त्यागकर इंसानियत की सेवा को अपने पूर्वजों की तरह लक्ष्य बनाया। उन्होंने कभी किसी धर्म या मजहब को बुरा नहीं बताया और फरमाया कि ये सभी ईश्वर तक पहुँचने के रास्ते हैं परंतु ईश्वर की मंजिल एक है।

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कौमी एकता दरवाज़ा ,बाराबंकी 

----------------------------------------------------------------------------------बाराबंकी में देखने के लिए अन्य स्थल-

१-पारिजात का पेड़ -

बाराबंकी पारिजात वृक्ष के लिए विश्व प्रसिद्ध है.
पारिजात बाराबंकी जिला मुख्यालय से  लगभग ३९  किलोमीटर की दूरी पर स्थित किन्तूर गांव में है। किन्तुर नाम पाण्डवों की माँ कुंती के नाम पर पड़ा था 
यहीं  एक पुराना मंदिर है माना जाता है की इसकी  स्थापना कुंती ने की थी।
स्वर्ग से लाया गया कल्पवृक्ष 


सफ़ेद फूल देखा?

 मंदिर के समीप लगभग 5000 वर्ष पुराना एक वृक्ष है। इस वृक्ष की ऊंचाई लगभग 45 फीट है। 
इस वृक्ष में लगने वाले फूल काफी सुंदर और  सफेद होते हैं ।
इसका नाम पारिजात है  
कहते हैं  कि इस वृक्ष को अर्जुन स्वर्गसे लाए थे। जब कि कृष्ण भक्त मानते हैं कि इसे  भगवान कृष्ण अपनी रानी सत्याभामा के लिए स्वर्ग से  लाए थे। 
मान्यता है  कि इस कल्पवृक्ष के नीचे  खड़े होकर मांगी हुई मन्नत जरूर पूरी होती है।
डाक टिकट -पारिजात वृक्ष 

२-महादेवा: 

कांवरियों की तीर्थस्थली मानी जाने वाली इस जगह पर भगवान शिव का प्रसिद्ध मंदिर लोधीश्वर मंदिर है


-श्री त्रिलोकपुर तीर्थ:
 भगवान नेमिनाथ को समर्पित है इस मंदिर में  स्थित  मूर्ति में भगवान के मुख के हाव-भावबदलते रहते हैं। 
सुबह के समय उनका मुख एक बच्चे के समान, दिन के समय  वयस्क और रात को एक वृद्ध  के मुख की तरह दिखाई देता है [जो यहाँ का मुख्य आकर्षण भी है]

इन स्थानों के अलावा  यहाँ 
--सिद्धेश्वर मंदिर, सतरिख,कोटव धाम मंदिर तथा बाबा जगजीवन दास का मंदिर  है जिसके पास के पवित्र तालाब में प्रत्येक वर्ष अक्टूबर और अप्रैल माह में हजारों की संख्या में भक्त करने आते हैं। 


कैसे जाएँ--

वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा लखनऊ 


रेल मार्ग: नजदीकी रेलवे स्टेशन बाराबंकी रेलवे स्टेशन.

सड़क मार्ग: बाराबंकी सड़कमार्ग कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है

कब जाएँ -
सबसे अच्छा मौसम  अक्टूबर से अप्रैल तक रहता है

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1 comment:

महेन्‍द्र कुमार said...

आज के समय मे इन प्रयासो की जरूरत है। आपसी समता सरसता के लिये ये प्रयास प्राणवायु का काम करेंगे। मेरे लिये ये नवीन जानकारी और भारत भूमि की सांस्‍कृतिक की गहरी जड़ो से परिचय करना रहा। अल्‍पना जी आपको बहुत बहुत साधुवाद।