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जिब्राल्टर ऑफ इंडिया’ अर्थात ग्वालियर दुर्ग


मध्य प्रदेश राज्य का ग्वालियर शहर जो दिल्ली से 318 किलोमीटर व आगरा से मात्र 110 किलोमीटर
दक्षिण में आगरा-मुम्बई राष्ट्रीय मार्ग पर स्थित है.'संगीत और बावड़ियों का शहर' 'ग्‍वालियर के दो
स्‍वरूप हैं – एक पुराना जो तीन भागों में विभक्‍त है -कण्‍टोंमेंट , लश्‍कर और मुरार.
दूसरा स्वरूप नया ग्वालियर है.

ग्वालियर का उल्लेख पौराणिक गाथाओं में भी मिलता है.महाराष्ट्र के सतारा जिले से आये
सिंधिया परिवार ने नवीन ग्वालियर की स्थापना की थी.यहाँ स्थित बावडियां गवाह हैं कि जल संरक्षण में
लोग यहाँ कितने गंभीर रहे थे.फजल अली के एतिहासिक ग्रंथ - 'कुलियाते ग्वालियर' कहता हैं कि
ग्वालियर राज्य की नींव ही एक बावड़ी की स्थापना के साथ हुई .

एक जमींदार सूरसेन ने एक भव्य बावड़ी का निर्माण करके ग्वालियर राज्य की स्थापना की थी , यह
ऐतिहासिक बावड़ी ''सूरजकुंड ''आज भी ग्वालियर दुर्ग में स्थित है.

‘जिब्राल्टर ऑफ इंडिया’ अर्थात ग्वालियर दुर्ग

ग्वालियर शहर के गोपगिरि/गोप पर्वत/गोपाद्रि व गोपचन्द्र गिरीन्द्र आदि नामों से प्रसिद्द गोपाचल पर्वत पर
स्थित है यह 'ग्वालियर किला 'भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है.

आठवीं से दसवीं शताब्दी में मध्ययुगीन प्रतिहारी कछवाहा (कच्छपघात) शासकों के शासन काल में
ग्वालियर का स्वर्णिम युग था.
सन् १३९४ से १५७२ तक तोमरवंशी राजाओं ने यहाँ राज्य किया.

लाल बलुआ पत्थर से बना यह किला शहर की हर दिशा से दिखाई देता और एक ऊंचे पठार पर बने इस
किले तक पहुंचने के लिये एक बेहद ऊंची चढाई वाली पतली सडक़ से होकर जाना होता है.इसकी तलहटी
में लगभग 50 हजार की आबादी बस्ती है.

निर्माण

जे यू पुरातत्व अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष प्रो. आर ए शर्मा के मुताबिक-
 45 मीटर ऊंचे और 11.85 किलोमीटर की परिधि ,[चौड़ाई लगभग एक किमी] वाले इस ग्वालियर दुर्ग का निर्माण ५२५ AD शताब्दी में राजा सूरजसेन ने करवाया था. उनसे पहले पाटली पुत्र के नंद वंश का शासन था .इसके बाद कछवाहा,तोमर और मुगल राजवंशों का शासन किले पर रहा. सभी ने अपने-अपने शासन काल में विभिन्न स्मारकों का निर्माण करवाया , सबसे अधिक निर्माण तोमर वंश के काल में हुए.

किले पर चार महल, मंदिर और नौ तालाब व मुख्यत तीन बावड़ियां हैं.नीली मीनाकारी इस किले की
खासियत है.

परिसर में स्थित मानमंदिर महल मानसिंह और गुर्जरी रानी के प्रेम का प्रतीक है.यहाँ चीनी वास्तुकला का भी प्रभाव दिखाई देता है.

महल में नीचे दो तल हैं.निचले प्रथम तल पर एक पानी का कुंड था.कहते हैं रानी के कहने पर नदी की धारा यहाँ तक लायी गयी थी.उसके नीचे वाले तल में गर्मियों मे राजा रानी रहते थे.जहाँ झूले भी लगे थे.
अंग्रेजों के समय यह कुंड बंद कर दिया गया था और मुगलों के समय सब से निचले तल में कैदियों को प्रताड़ित करने का स्थान बनाया गया था.अब वहाँ की छत पर आप को चमगादड दिखाई देंगे.

किले के भीतरी हिस्सों में मध्यकालीन स्थापत्य के अद्भुत नमूने स्थित हैं.पन्द्रहवीं शताब्दि में निर्मित मृगनयनी [गुर्जरी ] महल के बाहरी भाग को उसके मूल स्वरूप में राज्य के पुरातत्व विभाग ने सप्रयास सुरक्षित रखा है किन्तु आन्तरिक हिस्से को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया है जहां दुर्लभ प्राचीन मूर्तियां रखी गई हैं जो कार्बन डेटिंग के अनुसार प्रथम शती ए डी की हैं.

ग्वालियर किले के चारों ओर दीवार का निर्माण राजा मानसिंह तोमर के दादा डुंगरेंद्र सिंह ने 14वीं शताब्दी में करवाया था.
बाबर के आक्रमण के दौरान ,1857 में अंग्रेजों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बीच हुए युद्ध में किले की दीवार को काफी नुक्सान हुआ था.
यह किला स्थापत्य कला के कारण काफी जाना जाता है.परिसर में ही एक और दुर्लभ बावड़ी स्थित है -

एक पत्थर की बावड़ी! अद्भुत वास्तु कौशल से निर्मित इस बावड़ी का निर्माण तत्कालीन तोमर शासक डूंगरेंद्र सिंह और कीर्ति सिंह (1394-1520) ने कराया था.
तात्कालीन जैन धर्मावलंबी तोमरवंशी राजाओं के द्वारा बनवाई गयीं जैन तीर्थकरों की विशाल प्रतिमाएं अत्यंत भव्य हैं.भगवान पार्श्वनाथ की पद्मासनस्थ प्रतिमा मुख्य आकर्षण है और यह स्थान जैन
धर्मावलंबियों का बड़ा तीर्थ क्षेत्र है.
ग्वालियर दुर्ग के बारे में इब्नबतूता ने जो अपना यात्रा वृतांत लिखा है कि ''किले के अंदर काफी पानी के हौज हैं. किले की दीवार मिले हुए 20 कुएँ हैं जिनके पास ही दीवार में मजनीक और अरादे लगे हुए हैं.' यहाँ मध्य युग में 21 कुएँ, सरोवर और बावड़ियों की मौजूदगी का उल्लेख मिलता है । इनमें से गंगोला ताल ,जौहर ताल, तिकोनिया ताल, रानी ताल, चेरी ताल, एक खंबा ताल, कटोरा ताल, नूर सागर अभी भी अवशेष की दशा में मौजूद हैं ।

यहाँ पास ही में स्थित तानसेन का मकबरा है , चतुर्भुज मंदिर, तेली का मंदिर व सास-बहू का मंदिर पर्यटकों के लिये खास आकर्षण का केन्द्र हैं.
वर्तमान में इस दुर्ग के कई भाग कमज़ोर हो गए हैं जिनकी मरम्मत की जा रही है.

इस दुर्ग की देखरेख ए एस आई के अलावा राज्य पुरातत्व विभाग भी करता है. दुर्ग को देखने के लिए देश से ही नहीं, विदेशों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं.
------------------तस्वीरों में कुछ झलकियाँ देखें-----
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हाथी पोल 
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गुर्जरी महल 
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चित्र-गूगल से साभार 

6 comments:

आशा जोगळेकर said...

ग्वालियर किले के बारे में आपका यह लेख पढ कर कितनी पुरानी यादें ताजा हो गईं । इस किले पर बचपन में जब जाते थे आते हुए जेबी मंघाराम बिस्किट फेक्टरी में भी जाते थे फिर किशोर वय में पढा वृंदावन लाल वर्मा जी का मृगनयनी उपन्यास ।
बहुत सुंदर विस्तृत वर्णन ।

आशा जोगळेकर said...

बहुत सुंदर । पुरानी यादें ताजा हो गईं ।

Sriprakash Dimri said...

बेहद भव्य ओर गौरवशाली इतिहास का जीवंत प्रस्तुतीकरण ...आभार ...शुभ कामनाएं !!!

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

कई दफा ग्वालियर गया हूं
पर इतनी बारीक नजरों से ग्वालियर को देखा ही नहीं
बढिया और संग्रहणीय लेख

kainco said...

अल्पना वर्मा जी बहुत सुंदर है आप के खिचे हुए फोटो और अच्छा लिखा है आपने
आपका धन्यवाद

Vikas Gupta said...

बहुत ही सुंदर और गहन जानकारी। आपका साधुवाद इतनी जानकारी प्रदान करने के लिए। अब तो ग्वालियर घूमने की इच्छा प्रबल हो गयी है