कन्याकुमारी



आज आप को लिए चलते हैं, भारतभूमि के अंतिम कोने की ओर ..अर्थात कन्याकुमारी .

छुटपन में जब हम कन्याकुमारी घूमने गए तब बस से उतरते ही अपने जीवन में पहली बार समुन्दर देखा.दूर तक फैली हुई नीली चादर की तरह ,बहुत शांत बहता सा,इतना खूबसूरत लगा था कि वह नज़ारा अब तक आँखों में बसा है.

कन्या कुमारी तमिलनाडू प्रान्त के सुदूर दक्षिण तट पर बसा एक शहर है.यह हिन्द महासागर, बंगाल की खाङी तथा अरब सागर का संगम स्थल है, जहां प्रकृति अपने विभिन्न रंगो से मनोरम छटा बिखेरती है. यह स्थान वर्षो से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है.

सागर-त्रय के संगम की इस दिव्यभूमि पर मां भगवती देवी कुमारी के रूप में विद्यमान हैं. इस पवित्र स्थान को एलेक्जेंड्रिया ऑफ ईस्ट की उपमा से विदेशी सैलानियों ने नवाजा इस स्थान पर पहुंच कर लगता है मानो पूर्व में सभ्यता की शुरुआत यहीं से हुई होगी. अंग्रेजों ने इस स्थल को 'केप कोमोरिन 'कहा था.
यहां के सूर्योदय और सूर्यास्त का नज़ारा बेहद खूबसूरत दिखता है.


केरल राज्य के तिरुअनंतपुरम के बेहद निकट है.पहले यह शहर केरल राज्य में ही था.इस लिए भी अधिकतर लोग यहाँ मलयालम भाषी ही मिलेंगे.

सम्बंधित पौराणिक कथा -

भगवान शिव ने असुर बानासुरन को वरदान दिया था कि कुंवारी कन्या के अलावा किसी के हाथों उसका वध नहीं होगा.
प्राचीन काल में भारत पर शासन करने वाले राजा भरत को आठ पुत्री और एक पुत्र था। भरत ने अपना साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी संतानों को दे दिया. दक्षिण का हिस्सा उसकी पुत्री कुमारी को मिला।

कुमारी को शक्ति देवी का अवतार माना जाता था.कुमारी शिव से विवाह करना चाहती थीं. वहीँ बानासुरन को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसने कुमारी के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा. कुमारी ने कहा कि यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा तो वह उससे विवाह कर लेगी. दोनों के बीच युद्ध हुआ और बानासुरन को मृत्यु की प्राप्ति हुई.
कुमारी की याद में ही दक्षिण भारत के इस स्थान को कन्याकुमारी कहा जाता है. माना जाता है कि शिव और कुमारी के विवाह की तैयारी का सामान आगे चलकर रंग बिरंगी रेत में परिवर्तित हो गया.

दर्शनीय स्थल-

1-कन्याकुमारी अम्मन मंदिर-

कुमारी अम्मन मंदिर समुद्र तट पर स्थित है। पूर्वाभिमुख इस मंदिर का मुख्य द्वार केवल विशेष अवसरों पर ही खुलता है, इसलिए श्रद्धालुओं को उत्तरी द्वार से प्रवेश करना होता है। इस द्वार का एक छोटा-सा गोपुरम है। करीब 10 फुट ऊंचे परकोटे से घिरे वर्तमान मंदिर का निर्माण पांड्य राजाओं के काल में हुआ था। देवी कुमारी पांड्य राजाओं की अधिष्ठात्री देवी थीं। मंदिर से कुछ दूरी पर सावित्री घाट, गायत्री घाट, स्याणु घाट एवं तीर्थघाट बने हैं। इनमें विशेष स्नान तीर्थघाट माना जाता है। तीर्थघाट के स्नान के उपरांत भक्त मंदिर में दर्शन करने पहुंचते हैं।

घाट पर सोलह स्तंभ का एक मंडप बना है। मंदिर के गर्भगृह में देवी की अत्यंत सौम्य प्रतिमा विराजमान है। विभिन्न अलंकरणों से सुशोभित प्रतिमा केवल दीपक के प्रकाश में ही मनोहारी प्रतीत होती है। देवी की नथ में जडा हीरा एक अनोखी जगमगाहट बिखेरता है। कहते हैं बहुत पहले की बात है, मंदिर का पूर्वी द्वार खुला होता था तो हीरे की चमक दूर समुद्र में जाते जहाजों पर से भी नजर आती थी, जिससे नाविकों को किसी दूरस्थ प्रकाश स्तंभ का भ्रम होता था। इस भ्रम में दुर्घटना की आशंका रहती थी। इसी कारण पूर्वी द्वार बंद रखा जाने लगा। अब यह द्वार बैशाख ध्वजारोहण, उत्सव, रथोत्सव, जलयात्रा उत्सव जैसे विशेष अवसरों पर ही खोला जाता है। माना जाता है कि चैतन्य महाप्रभु इस मंदिर में जलयात्रा पर्व पर आए थे।

इसी परिसर में महादेव मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर और चक्रतीर्थ के दर्शन भी किए जा सकते हैं.


2-गांधी स्मारक-

यह स्मारक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित है। यही पर महात्मा गांधी की चिता की राख रखी हुई है। इस स्मारक की स्थापना 1956 में हुई थी। महात्मा गांधी 1937 में यहां आए थे। उनकी मृत्‍यु के बाद 1948 में कन्याकुमारी में ही उनकी अस्थियां विसर्जित की गई थी। स्मारक को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि महात्मा गांधी के जन्म दिवस पर सूर्य की प्रथम किरणें उस स्थान पर पड़ती हैं जहां उनकी राख रखी हुई है।

3-कवि तिरुवल्लुवर की विशाल प्रतिमा
संत कवि तिरुवल्लुवर की प्रतिमा

सागर तट से कुछ दूरी पर मध्य में दो चट्टानें नजर आती हैं। दक्षिण पूर्व में स्थित इन चट्टानों में से एक चट्टान पर विशाल प्रतिमा पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है। वह प्रतिमा प्रसिद्ध तमिल संत कवि तिरुवल्लुवर की है। वह आधुनिक मूर्तिशिल्प 5000 शिल्पकारों की मेहनत से बन कर तैयार हुआ था। इसकी ऊंचाई 133 फुट है, जो कि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित काव्य ग्रंथ तिरुवकुरल के 133 अध्यायों का प्रतीक है।


4-विवेकानंद रॉक मेमोरियल-
स्वामी विवेकानंद रॉक मेमोरियल
समुद्र में उभरी दूसरी चट्टान पर दूर से ही विवेकानंद रॉक मेमोरियल नजर आता है। 1892 में स्वामी विवेकानंद कन्याकुमारी आए थे। एक दिन वे तैर कर इस विशाल शिला पर पहुंच गए। इस निर्जन स्थान पर साधना के बाद उन्हें जीवन का लक्ष्य एवं लक्ष्य प्राप्ति हेतु मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ। विवेकानंद के उस अनुभव का लाभ पूरे विश्व को हुआ, क्योंकि इसके कुछ समय बाद ही वे शिकागो सम्मेलन में भाग लेने गए थे। इस सम्मेलन में भाग लेकर उन्होंने भारत का नाम ऊंचा किया था। उनके अमर संदेशों को साकार रूप देने के लिए 1970 में उस विशाल शिला पर एक भव्य स्मृति भवन का निर्माण किया गया। लाल पत्थर से निर्मित स्मारक पर 70 फुट ऊंचा गुंबद है। भवन के अंदर चार फुट से ऊंचे प्लेटफॉर्म पर परिव्राजक संत स्वामी विवेकानंद की प्रभावशाली मूर्ति है। यह मूर्ति कांसे की बनी है जिसकी ऊंचाई साढे आठ फुट है।

इस स्थान को श्रीपद पराई के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर कन्याकुमारी ने भी तपस्या की थी। पाद मंडप में देवी के पदचिह्न के दर्शन भी किए जा सकते हैं|

5-सुचिन्द्रम-यहां का थानुमलायन मंदिर काफी प्रसिद्ध है।


6-नागराज मंदिर-कन्याकुमारी से 20 किमी दूर नगरकोल का नागराज मंदिर नाग देव को समर्पित है।

7-- पदमानभापुरम महल-- त्रावनकोर के राजा द्वारा बनवाया हैं।


8-कोरटालम झरना-इस झरने के जल को औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है.

9-तिरूचेन्दूर-भगवान सुब्रमण्यम को समर्पित मंदिर है.

10-उदयगिरी किला-कन्याकुमारी से 34 किमी दूर यह किला राजा मरतड वर्मा द्वारा 1729-1758 ई. दौरान बनवाया गया था। इसी किले में राजा के विश्वसनीय यूरोपियन दोस्त जनरल डी लिनोय की समाधि भी है।


11-एक ही स्थान से सूर्यास्त और सूर्योदय का अपूर्व मंजर बस कन्याकुमारी में ही देखने को मिल सकता है।
१२-सुनामी स्मारक


सुनामी स्मारक ,कन्याकुमारी[तमिलनाडु]
सुनामी का अर्थ है समुद्री तूफान.यह एक प्राकृतिक आपदा है.सूनामी जापानी शब्द है जो सू और नामी से मिल कर बना है सू का अर्थ है समुद्र तट औऱ नामी का अर्थ है लहरें.
समुद्र के भीतर अचानक जब बड़ी तेज़ हलचल होने लगती है तो उसमें उफान उठता है.सैकड़ों किलोमीटर चौड़ाई वाली लहरें जब तट के पास आती हैं, तब लहरों का निचला हिस्सा ज़मीन को छूने लगता है. इनकी गति कम हो जाती है और ऊँचाई बढ़ जाती है.ऐसी स्थिति में जब ये तट से टक्कर मारती हैं तो तबाही होती है। उसके रास्ते में पेड़, जंगल या इमारतें कुछ भी आएँ सब को तबाह कर देती है।
अक्सर समुद्री भूकम्पों की वजह से ये तूफ़ान पैदा होते हैं.

२६ दिसंबर २००४ के दिन हिंद महासागर के लगभग 14 देश सुनामी के प्रकोप का शिकार हुए थे.सबसे ज़्यादा प्रभावित इंडोनेशिया के आचेह प्रांत में सुनामी ने लगभग 1 लाख 70 हज़ार लोगों की जानें ले लीं थी.
भारत में आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, और पांडिचेरी में 34 लाख से ज्यादा लोग इससे प्रभावित हुए.अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भी जबरदस्त नुकसान पहुँचाया.एक जानकारी के अनुसार लगभग १५ हज़ार व्यक्तियों की इस जलजले से मृत्यु हुई.[सही आंकड़ा ज्ञात नहीं है]. इनमें 10 हजार लोग तो अकेले तमिलनाडु के तटीय इलाकों के ही रहने वाले थे.

तमिलनाडु के कन्याकुमारी में सुनामी में मारे गये लोगों की याद में सुनामी स्मारक बनाया गया है.

स्टील के बने इस स्मारक की ऊँचाई १६ फुट है.

इस में जो दो हाथ बने हैं उनमें एक से सागर की लहर को रोकते हुए और दूसरे हाथ में आशा का दीपक जलाये रखते हुए दिखाया गया है.इस के डिजाईन को बनानेवाले श्री बी.कनगराज हैं.
अगर आप कन्याकुमारी जाएँ तो यहाँ भी अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करें.सुनामी में मृतकों को भावभीनी श्रद्धांजलि।
कैसे जाएँ -

1-यहां के लिए तिरुवनंतपुरम (86 कि.मी.) यहां का निकटतम हवाई अड्डा है,
2-जबकि दक्षिण रेलवे के तिरुवनंतपुरम-कन्याकुमारी सेक्शन पर कन्याकुमारी रेलवे स्टेशन है। हिमसागर एक्सप्रेस -जम्मू-तवी से कन्याकुमारी तक ले जाने वाली ट्रेन हमारे देश की सबसे लंबी दूरी की ट्रेन है ,नई दिल्ली से हिमसागर एक्सप्रेस में लगभग 56 घंटे लगते हैं.बेहद रोमांचक!
3-यह शहर दक्षिण भारत के सभी महत्वपूर्ण स्थानों से सड़क मार्ग से भी जुड़ा हुआ है।


कब जाएँ-
कभी भी -साल भर मनोरम वातावरण रहता है .

खरीदें-
विभिन्न रंगों के रेत के पैकेट , सीप और शंख,शंख-सीपियों से बनी छोटी-छोटी मालाएं,प्रवाली शैलभित्ती के टुकडे , केरल शैली की नारियल जटाएं ,ताड़ की पत्तियों से बनी उपयोगी वस्तुएं और लकड़ी की हैंडीक्राफ्ट भी खरीदी जा सकती है.
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रम और इतिहास के जानकारों से मैं जानना चाहती हूँ कि क्या इस कहानी में उल्लेखित 'बानासुरन ' , वही बाणासुर है जो कि हिन्दू दर्शन के अनुसार हजार हाथों वाला एक राक्षस था जिसे बाली का पुत्र एवं रावण का वंशज के रूप में हम सभी जानते हैं.बाणासुर का भगवन कृष्ण के साथ युद्ध हुआ था और उनके पोते अनिरुद्ध के साथ बाणासुर की बेटी 'उषा 'की शादी हुई थी.बेटी की शादी के बाद बाणासुर ने अपना बचा हुआ जीवन भगवान शिव की आराधना में हिमालय पर बिता दिया.
जबकि इस कहानी में बानासुरन का वध कुमारी के हाथों हुआ.
मैं ने अंतरजाल पर कन्याकुमारी कहानी वाले ' बानासुरन 'और लोहाघाट [उत्तराँचल ]प्रसिद्धि वाले 'बाणासुर 'के बीच कोई सम्बन्ध बताने वाली जानकारी खंगालानी चाही मगर सफलता नहीं मिली.



References-
-Wikipedia
-Official site of Kanyakumari.

Kanyakumari After tsunami --watch this video clip--